Archive for February 16th, 2006
एलेक्ट्रानिक मज़हब
आओ मज़हब-मज़हब खेलते हैं, तुम हमारे मज़हब का कारटून बनाओ और हम तुम्हारे मज़हब का बनाते हैं। बहुत मज़ा आये गा इस खेल में जब सभी मज़हबों कि बुराइयाँ खुल कर एक दूसरे को मालूम हों। लेकिन मज़हबों में बुराइयाँ कैसी? सभी मज़हब तो पाक व साफ़ हैं! सभी मज़हबों में अच्छी बातें होती हैं। मज़हब तो अपनी जगा ठीक है मगर ये मज़हबी लोग? मज़हबी लोगों में नफ़रत है एक दूसरे के लिये, हर किसी को अपना मज़हब प्यारा है और इसी यक़ीन पर वे दूसरे मज़हबों से नफ़रत करते हैं भले वे आपस में एक दूसरे के मित्र हों मगर दिल में बहुत कुछ रखते हैं।
किया ज़रूत है ऐसे मज़हबों की जो हम इनसानों को ग्रुपों में बांट दिया जैसे जंगल में जानवर अपने अलग ग्रुप बनाये रहते हैं और एक दूसरे पर हमला करते रहते हैं।
साइंसदानों से गुज़ारिश है कि वे इस नये दौर के लिये कुछ ईसा नया एलेक्ट्रॉनिक मज़हब बनाये ताकि दुनिया भर के इनसान सब एक हो जायें क्योंकि साईंस्दान जो भी चीज़ बनाते हैं लोग उसे अपना लेते हैं। किया ईसा होगा?
6 comments February 16, 2006
