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	<title>Comments on: मैं मुसलमान क्यों नहीं</title>
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	<description>MY HINDI BLOG</description>
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		<title>By: नीरज दीवान</title>
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		<dc:creator>नीरज दीवान</dc:creator>
		<pubDate>Sun, 05 Oct 2008 15:55:46 +0000</pubDate>
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		<description>शुएब, मैं मुरीद हूं तुम्हारा.. कई दिनों बाद गूगल पर खंगालते हुए यह लेख दोबारा पढ़ा.. यार हम ऐसी ही दुनिया चाहते हैं जो मानने और ना मानने वालों में फ़र्क ना करे.. क्योंकि हम सब इंसान हैं और ईश्वर (यदि हो तो) ने हमें बनाने में फ़र्क नहीं किया. 

वैश्विक मानवता कायम रहे.. बुलंद रहे हमारे हौसले.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>शुएब, मैं मुरीद हूं तुम्हारा.. कई दिनों बाद गूगल पर खंगालते हुए यह लेख दोबारा पढ़ा.. यार हम ऐसी ही दुनिया चाहते हैं जो मानने और ना मानने वालों में फ़र्क ना करे.. क्योंकि हम सब इंसान हैं और ईश्वर (यदि हो तो) ने हमें बनाने में फ़र्क नहीं किया. </p>
<p>वैश्विक मानवता कायम रहे.. बुलंद रहे हमारे हौसले.</p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: Balendu Sharma Dadhich</title>
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		<dc:creator>Balendu Sharma Dadhich</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 28 Sep 2006 18:46:14 +0000</pubDate>
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		<description>शुएब भाई,
आपको मैं एक universal humanist कहूंगा एक विश्व मानव, जो किसी का बुरा नहीं चाहता, सबको समवेत नजरों से देखता है और मजहबी कट्टरता तथा संकीर्णताओं से मुक्त है। यह बहुत बड़े जोखिम और साहस का काम है जो आपने किया है। सभी धर्मों में खामियां हैं (और अच्छाइयां भी) लेकिन समस्या यह है कि उनमें आत्मालोचना और संशोधन की कोई व्यवस्था नहीं है। इस संदर्भ में अतुल अरोरा की कहानी बहुत सटीक है। यदि धर्म भी समय के साथ-साथ आगे बढ़ें और सामाजिक परिस्थितियों के अनुरूप अपने को बदलें तो शायद वे उतने क्रूर, किताबी, अनुदार, अप्रासंगिक और पिछड़े हुए नहीं रह जाएं।

वैसे धर्म के मजहबी (आध्यात्मिक और पूजापाठी) स्वरूप को छोड़ दें तो यह एक सामाजिक व्यवस्था भी है जो बलपूर्वक ही सही, मनमाने ढंग से ही सही, चीजों को अनुशासित करती है। वह छोटे-छोटे समूहों के अराजक हो जाने की प्रवृत्ति को नियंत्रित करती है। उस लिहाज से, एक संस्था के रूप में, धर्म की उपयोगिता जरूर है। आपकी टिप्पणी विचारोत्तेजक और आंखें खोलने वाली है। लेकिन आपने यह स्पष्ट नहीं किया कि आपको मजहब से विरक्ति हुई क्यों? ऐसा मैं सिर्फ उत्सुकतावश पूछ रहा हूं, चाहें तो जवाब दें।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>शुएब भाई,<br />
आपको मैं एक universal humanist कहूंगा एक विश्व मानव, जो किसी का बुरा नहीं चाहता, सबको समवेत नजरों से देखता है और मजहबी कट्टरता तथा संकीर्णताओं से मुक्त है। यह बहुत बड़े जोखिम और साहस का काम है जो आपने किया है। सभी धर्मों में खामियां हैं (और अच्छाइयां भी) लेकिन समस्या यह है कि उनमें आत्मालोचना और संशोधन की कोई व्यवस्था नहीं है। इस संदर्भ में अतुल अरोरा की कहानी बहुत सटीक है। यदि धर्म भी समय के साथ-साथ आगे बढ़ें और सामाजिक परिस्थितियों के अनुरूप अपने को बदलें तो शायद वे उतने क्रूर, किताबी, अनुदार, अप्रासंगिक और पिछड़े हुए नहीं रह जाएं।</p>
<p>वैसे धर्म के मजहबी (आध्यात्मिक और पूजापाठी) स्वरूप को छोड़ दें तो यह एक सामाजिक व्यवस्था भी है जो बलपूर्वक ही सही, मनमाने ढंग से ही सही, चीजों को अनुशासित करती है। वह छोटे-छोटे समूहों के अराजक हो जाने की प्रवृत्ति को नियंत्रित करती है। उस लिहाज से, एक संस्था के रूप में, धर्म की उपयोगिता जरूर है। आपकी टिप्पणी विचारोत्तेजक और आंखें खोलने वाली है। लेकिन आपने यह स्पष्ट नहीं किया कि आपको मजहब से विरक्ति हुई क्यों? ऐसा मैं सिर्फ उत्सुकतावश पूछ रहा हूं, चाहें तो जवाब दें।</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: अतुल श्रीवास्तव</title>
		<link>http://shuaibi.wordpress.com/2006/03/20/%e0%a4%ae%e0%a5%88%e0%a4%82-%e0%a4%ae%e0%a5%81%e0%a4%b8%e0%a4%b2%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%a8-%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a5%8b%e0%a4%82-%e0%a4%a8%e0%a4%b9%e0%a5%80%e0%a4%82/#comment-47</link>
		<dc:creator>अतुल श्रीवास्तव</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 03 Apr 2006 22:28:00 +0000</pubDate>
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		<description>बिलकुल सहमत हूँ - पहले देश बाकी सब बाद में. यदि कोई भी धर्म देश की उन्नति, शाँति या अखंडता को खतरा पहुँचाता है तो गोली मारो ऐसे धर्म को - अरे भैय्या अगर देश ही नहीं रहेगा तो हम सब धर्म का मुरब्बा डालेंगे क्या?

काश सारे भारतीय ऐसे सोच पाते...</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>बिलकुल सहमत हूँ &#8211; पहले देश बाकी सब बाद में. यदि कोई भी धर्म देश की उन्नति, शाँति या अखंडता को खतरा पहुँचाता है तो गोली मारो ऐसे धर्म को &#8211; अरे भैय्या अगर देश ही नहीं रहेगा तो हम सब धर्म का मुरब्बा डालेंगे क्या?</p>
<p>काश सारे भारतीय ऐसे सोच पाते&#8230;</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: Tarun</title>
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		<dc:creator>Tarun</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 28 Mar 2006 08:40:00 +0000</pubDate>
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		<description>शुऐब, 
पढ़ने में थोड़ी देर हो गई लेकिन वाकई एक मुसलमान के लिए इस तरह की बात करना बहुत हिम्मत का काम है। काश आप जैसे और हिन्दू-मुसलमान होते जो मुल्क को मज़हब से ज़्यादा तरजीह देते तो कितना अच्छा होता। मैने अपनी जिंदगी मे इतना ईमानदार मुसलमान  नही देखा.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>शुऐब,<br />
पढ़ने में थोड़ी देर हो गई लेकिन वाकई एक मुसलमान के लिए इस तरह की बात करना बहुत हिम्मत का काम है। काश आप जैसे और हिन्दू-मुसलमान होते जो मुल्क को मज़हब से ज़्यादा तरजीह देते तो कितना अच्छा होता। मैने अपनी जिंदगी मे इतना ईमानदार मुसलमान  नही देखा.</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: अनाम</title>
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		<dc:creator>अनाम</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 25 Mar 2006 18:45:00 +0000</pubDate>
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		<description>आपका ब्लॉग पहली बार पढ़ा और आपके नए विचाए देखकर बहुत प्रसन्नता हुई। ऐसे ही लिखते जाइये!</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>आपका ब्लॉग पहली बार पढ़ा और आपके नए विचाए देखकर बहुत प्रसन्नता हुई। ऐसे ही लिखते जाइये!</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: आशीष कुमार</title>
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		<dc:creator>आशीष कुमार</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 23 Mar 2006 04:08:00 +0000</pubDate>
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		<description>शुयेब भाई

लो हम अपनी गलती सुधार लेते है, आप एक सच्चे ईन्सान है.

क्या आपने &quot;स्वामी वाहिद काज़मी&quot; को पढा है ?
एक बार उन्हे पढकर देखिये. वे मेरे प्रिय लेखको मे से है. उन्होने मजहबी संकीर्णता पर जितना प्रहार किया है उतना और कीसी ने नही.

http://rachanakar.blogspot.com/2005/09/blog-post_20.html
http://rachanakar.blogspot.com/2005/08/blog-post_26.html
http://rachanakar.blogspot.com/2005/10/blog-post_29.html
http://rachanakar.blogspot.com/2005/10/blog-post_03.html

आपका
आशीष
&lt;a HREF=&quot;http://ashish.net.in/khalipili&quot; rel=&quot;nofollow&quot;&gt; खालीपीली&lt;/A&gt;</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>शुयेब भाई</p>
<p>लो हम अपनी गलती सुधार लेते है, आप एक सच्चे ईन्सान है.</p>
<p>क्या आपने &#8220;स्वामी वाहिद काज़मी&#8221; को पढा है ?<br />
एक बार उन्हे पढकर देखिये. वे मेरे प्रिय लेखको मे से है. उन्होने मजहबी संकीर्णता पर जितना प्रहार किया है उतना और कीसी ने नही.</p>
<p><a href="http://rachanakar.blogspot.com/2005/09/blog-post_20.html" rel="nofollow">http://rachanakar.blogspot.com/2005/09/blog-post_20.html</a><br />
<a href="http://rachanakar.blogspot.com/2005/08/blog-post_26.html" rel="nofollow">http://rachanakar.blogspot.com/2005/08/blog-post_26.html</a><br />
<a href="http://rachanakar.blogspot.com/2005/10/blog-post_29.html" rel="nofollow">http://rachanakar.blogspot.com/2005/10/blog-post_29.html</a><br />
<a href="http://rachanakar.blogspot.com/2005/10/blog-post_03.html" rel="nofollow">http://rachanakar.blogspot.com/2005/10/blog-post_03.html</a></p>
<p>आपका<br />
आशीष<br />
<a HREF="http://ashish.net.in/khalipili" rel="nofollow"> खालीपीली</a></p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: SHUAIB</title>
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		<dc:creator>SHUAIB</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 21 Mar 2006 08:52:00 +0000</pubDate>
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		<description>अतुल अरोरा जीः
पहले तो शुक्रिया के धर्म पर इतनी अच्छी मिसाल लिखा आपने, ये सब धर्म हमारे परखूँ ने बनाये थे जिसे आगे चल कर लोगों ने नये नये तरीके अपना लिए।

रमण कौल जीः
बहतरीन टिप्पणी देने के लिये आप का शुक्रिया, सब लोग मेरे और आपकी तरह कहां सोचते हैं मज़हबी लोगों के दिमाग पर ताले लग चुके हैं जिसकी चाबी ही नहीं है। हमारे देश में इतने सारे धर्म और सबका अलग अलग दिमाग भला कौन समझाये उन्हें?

Ravi Kamdar भाईः
मैं ने आप का ताज़ा लेख आप के ब्लॉग पर पढा और उस पर टिप्पणी भी लिखा है, वही टिप्पणी यहां भी लिख रहा हूं
आपके लेख से ज़ाहिर है आप ने पहली बार अपना पूरा गुस्सा उतार लिया है, ब्लॉग आप का है और आप अपने मन की सब बातें उस पर लिख सकते हैं आप अपने ब्लॉग के राजा हैं। पर मेरी आप से एक गुज़ारिश है के हमें किसी भी धर्म के खिलाफ कुछ लिखने और बोलने का अधिकार नहीं, अगर आप को अपना धर्म पसंद नहीं तो धर्म छोड दो जैसे मैं ने किया है पर धर्म की बुराई न करो। ये धर्म हमारे बुज़रगों ने बनाये थे ताकि उनका खानदान एक होकर रहे मगर उनका ख्वाब चूर चूर होगिया क्योंकि हम एक खानदान से हज़ारों में बंट गये। ये सिर्फ आप ही नहीं बलके आप के जैसे भारत में हज़ारों नौजवान हैं जो अपने धर्मों से बेज़ार हो चुके हैं, हर दिन भारत में मज़हबी फसाद से तंग आगऐ। वो दिन दूर नहीं हमारी आने वाली पीढी सब अपने धर्मों से निकल कर इनसान बनना चाहेंगे।

Hindi Blogger:
भाई माफ करना मुझे आप का नाम नहीं मालूम, ये हिन्दी मैं ने खुद इन्टरनेट से सिखा है और टईपिंग भी खुद से। Pratik भाई ने मुझे एक लिंक की तरफ इशारा दिया जहां पर एक छोटा सा सॉफ्टवेर डौनलोड के लिये रखा है जो हिन्दी को उर्दू में ट्रांसलेट करता है जिसे पाकिस्तान के चंद स्टूडंस ने बनाया था। पर मुझे अभी तक ऐसा कोई प्रोग्राम नहीं मिला जो उर्दू को हिन्दी में ट्रांसलेट कर सके। भारत में कैसे कैसे प्रोग्रामर्स हैं और बहुत सारे अनोखे सॉफ्टवेर बना लिये पर अभी तक किसी भी स्टूडंट ने उर्दू से हिन्दी ट्रांसलेट वाला कोई सॉफ्टवेर नहीं बनाये। मेरे पास ऐसे बहुत सारे पोस्ट हैं जिसे मैं उर्दू से हिन्दी में ट्रांसलेट करना चाहता हूं। रमण कौल जी और दूसरे हिन्दी दोसतों से मेरी गुज़ारिश है के वो इस पर कुछ करें और सोचें। क्योंकि पाकिस्तानी ब्लॉगर्स भारत के खिलाफ बहुत कुछ लिखते हैं, मैं चाहता हूं के हिन्दी ब्लॉगर्स उनका लेख ट्रांसलेट करके पढे और खबरदार रहें जैसे वो हिन्दी को उर्दू में ट्रांसलेट करने का सॉफ्टवेर बना चुके हैं, देखें www.crulp.org

आशीष कुमार भाई:
शुक्रिया आप का, लगता है आप ने मेरा लेख पूरा नहीं पढा ;) तभी तो आप ने मुझे दुबारा एक सच्चा मुसलमान बना दिया, खैर एक बार फिर शुक्रिया आप का मेरा लेख पढने के लिये।

Pankaj Bengani:
अरे यार आप भी ;) आप ने मुझे ईमानदार कहा बहुत बहुत शुक्रिया, पर भाई ईमानदार के साथ मुसलमान भी लिख दिया तुमने, मुझे बडा दुख हुवा। अगर आप मुझे &quot;ईमानदार इनसान&quot; लिख देते तो कुछ ज़ियादा खुशी होती मुझे। एक बार फिर आप का शुक्रिया।

प्रत्यक्षा जीः
ऐसा मैं और आप ही सोच सकते हैं बाकी हमारी सौ करोड जनता कहां सोचती है, बस चले जारहे हैं, रोज़ रोज़ पूजा-नमाज़, गाली गलोच, तोड फोड, दंगे फसाद बस यही है हमारे देश की ज़िनदगी।

Jitendra Chaudhary भाईः
पहले तो हम इनसानों सब से में बडी चीज़ अपना दिमाग है, हम बहुत कुछ सोच सकते हैं पर अपने धर्म के बारे उलटी बातें सोचने पर दिल कहता है के &quot;छी - ये कैसी बातें मेरे दिमाग में आ रही हैं?&quot; मैं तो ये कहूँगा के अपने धर्म को अच्छी तरह समझने के लिये थोडी देर धर्म से बाहर अना चाहिये मगर ऐसा चोचना तो लोग बहुत बडा पाप सम्झते हैं। टिप्पणी लिखने के लिये आप का शुक्रिया।

Pratik भाईः
मैं ने आप को याद किया और आप हाज़िर। अभी इस टिप्पणी में ऊपर आप ही का ज़िकर किया है, आप ने मुझे हिन्दी से उर्दू में ट्रांसलेट करने का जो लिंक दिया था उस के लिये फिर एक बार शुक्रिया। ये ट्रांसलेट का सॉफ्टवेर पाकिसतानी सटूडंस ने बनाया है, किया ही अच्छा होता आप और रमण कौल जैसे हिन्दी दोसत मिलकर कुछ छोटा सा उर्दू से हिन्दी ट्रांसलेटर बनायें तो कई लोगों का भला हो सकता है। दूसरी बात बच्चा जब पैदा होता है तभी से उसके उसको नन्ने दिमाग में मज़हब को ठोंस देते हैं और वो कुछ बडा होकर अपने माता-पिता को देखते हुवे और भी पक्का मज़हबी बन जाता है फीर वो मज़हब से हट कर दूसरा कुछ नहीं सोचता।

Sanjay Bengani भाईः
आप उम्मीद रखें मुझ जैसे देश में और भी हैं जो मज़हब से बेज़ार हो चुके हैं। यहां सभी टिप्पणियों से ज़ाहिर है के हम सब देश में एक मज़हब एक कानून चाहते हैं ताके देश में फिर कभी दंगे-फसाद न हों। ये मज़हब ही है जो हम सब को एक दूसरे का दुशमन बना दिया है भले हम आपस एक-दूसरे के मित्र हों फिर भी दिल में नफरत होती है। आ औ हम सब जो गिनती के लोग हैं सब मज़हब से निकल कर एक होजाऐं, हमें प्यार चाहिये, दोसती भी चाहिये ताकि हम अमन से रह सकें।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>अतुल अरोरा जीः<br />
पहले तो शुक्रिया के धर्म पर इतनी अच्छी मिसाल लिखा आपने, ये सब धर्म हमारे परखूँ ने बनाये थे जिसे आगे चल कर लोगों ने नये नये तरीके अपना लिए।</p>
<p>रमण कौल जीः<br />
बहतरीन टिप्पणी देने के लिये आप का शुक्रिया, सब लोग मेरे और आपकी तरह कहां सोचते हैं मज़हबी लोगों के दिमाग पर ताले लग चुके हैं जिसकी चाबी ही नहीं है। हमारे देश में इतने सारे धर्म और सबका अलग अलग दिमाग भला कौन समझाये उन्हें?</p>
<p>Ravi Kamdar भाईः<br />
मैं ने आप का ताज़ा लेख आप के ब्लॉग पर पढा और उस पर टिप्पणी भी लिखा है, वही टिप्पणी यहां भी लिख रहा हूं<br />
आपके लेख से ज़ाहिर है आप ने पहली बार अपना पूरा गुस्सा उतार लिया है, ब्लॉग आप का है और आप अपने मन की सब बातें उस पर लिख सकते हैं आप अपने ब्लॉग के राजा हैं। पर मेरी आप से एक गुज़ारिश है के हमें किसी भी धर्म के खिलाफ कुछ लिखने और बोलने का अधिकार नहीं, अगर आप को अपना धर्म पसंद नहीं तो धर्म छोड दो जैसे मैं ने किया है पर धर्म की बुराई न करो। ये धर्म हमारे बुज़रगों ने बनाये थे ताकि उनका खानदान एक होकर रहे मगर उनका ख्वाब चूर चूर होगिया क्योंकि हम एक खानदान से हज़ारों में बंट गये। ये सिर्फ आप ही नहीं बलके आप के जैसे भारत में हज़ारों नौजवान हैं जो अपने धर्मों से बेज़ार हो चुके हैं, हर दिन भारत में मज़हबी फसाद से तंग आगऐ। वो दिन दूर नहीं हमारी आने वाली पीढी सब अपने धर्मों से निकल कर इनसान बनना चाहेंगे।</p>
<p>Hindi Blogger:<br />
भाई माफ करना मुझे आप का नाम नहीं मालूम, ये हिन्दी मैं ने खुद इन्टरनेट से सिखा है और टईपिंग भी खुद से। Pratik भाई ने मुझे एक लिंक की तरफ इशारा दिया जहां पर एक छोटा सा सॉफ्टवेर डौनलोड के लिये रखा है जो हिन्दी को उर्दू में ट्रांसलेट करता है जिसे पाकिस्तान के चंद स्टूडंस ने बनाया था। पर मुझे अभी तक ऐसा कोई प्रोग्राम नहीं मिला जो उर्दू को हिन्दी में ट्रांसलेट कर सके। भारत में कैसे कैसे प्रोग्रामर्स हैं और बहुत सारे अनोखे सॉफ्टवेर बना लिये पर अभी तक किसी भी स्टूडंट ने उर्दू से हिन्दी ट्रांसलेट वाला कोई सॉफ्टवेर नहीं बनाये। मेरे पास ऐसे बहुत सारे पोस्ट हैं जिसे मैं उर्दू से हिन्दी में ट्रांसलेट करना चाहता हूं। रमण कौल जी और दूसरे हिन्दी दोसतों से मेरी गुज़ारिश है के वो इस पर कुछ करें और सोचें। क्योंकि पाकिस्तानी ब्लॉगर्स भारत के खिलाफ बहुत कुछ लिखते हैं, मैं चाहता हूं के हिन्दी ब्लॉगर्स उनका लेख ट्रांसलेट करके पढे और खबरदार रहें जैसे वो हिन्दी को उर्दू में ट्रांसलेट करने का सॉफ्टवेर बना चुके हैं, देखें <a href="http://www.crulp.org" rel="nofollow">http://www.crulp.org</a></p>
<p>आशीष कुमार भाई:<br />
शुक्रिया आप का, लगता है आप ने मेरा लेख पूरा नहीं पढा <img src='http://s.wordpress.com/wp-includes/images/smilies/icon_wink.gif' alt=';)' class='wp-smiley' />  तभी तो आप ने मुझे दुबारा एक सच्चा मुसलमान बना दिया, खैर एक बार फिर शुक्रिया आप का मेरा लेख पढने के लिये।</p>
<p>Pankaj Bengani:<br />
अरे यार आप भी <img src='http://s.wordpress.com/wp-includes/images/smilies/icon_wink.gif' alt=';)' class='wp-smiley' />  आप ने मुझे ईमानदार कहा बहुत बहुत शुक्रिया, पर भाई ईमानदार के साथ मुसलमान भी लिख दिया तुमने, मुझे बडा दुख हुवा। अगर आप मुझे &#8220;ईमानदार इनसान&#8221; लिख देते तो कुछ ज़ियादा खुशी होती मुझे। एक बार फिर आप का शुक्रिया।</p>
<p>प्रत्यक्षा जीः<br />
ऐसा मैं और आप ही सोच सकते हैं बाकी हमारी सौ करोड जनता कहां सोचती है, बस चले जारहे हैं, रोज़ रोज़ पूजा-नमाज़, गाली गलोच, तोड फोड, दंगे फसाद बस यही है हमारे देश की ज़िनदगी।</p>
<p>Jitendra Chaudhary भाईः<br />
पहले तो हम इनसानों सब से में बडी चीज़ अपना दिमाग है, हम बहुत कुछ सोच सकते हैं पर अपने धर्म के बारे उलटी बातें सोचने पर दिल कहता है के &#8220;छी &#8211; ये कैसी बातें मेरे दिमाग में आ रही हैं?&#8221; मैं तो ये कहूँगा के अपने धर्म को अच्छी तरह समझने के लिये थोडी देर धर्म से बाहर अना चाहिये मगर ऐसा चोचना तो लोग बहुत बडा पाप सम्झते हैं। टिप्पणी लिखने के लिये आप का शुक्रिया।</p>
<p>Pratik भाईः<br />
मैं ने आप को याद किया और आप हाज़िर। अभी इस टिप्पणी में ऊपर आप ही का ज़िकर किया है, आप ने मुझे हिन्दी से उर्दू में ट्रांसलेट करने का जो लिंक दिया था उस के लिये फिर एक बार शुक्रिया। ये ट्रांसलेट का सॉफ्टवेर पाकिसतानी सटूडंस ने बनाया है, किया ही अच्छा होता आप और रमण कौल जैसे हिन्दी दोसत मिलकर कुछ छोटा सा उर्दू से हिन्दी ट्रांसलेटर बनायें तो कई लोगों का भला हो सकता है। दूसरी बात बच्चा जब पैदा होता है तभी से उसके उसको नन्ने दिमाग में मज़हब को ठोंस देते हैं और वो कुछ बडा होकर अपने माता-पिता को देखते हुवे और भी पक्का मज़हबी बन जाता है फीर वो मज़हब से हट कर दूसरा कुछ नहीं सोचता।</p>
<p>Sanjay Bengani भाईः<br />
आप उम्मीद रखें मुझ जैसे देश में और भी हैं जो मज़हब से बेज़ार हो चुके हैं। यहां सभी टिप्पणियों से ज़ाहिर है के हम सब देश में एक मज़हब एक कानून चाहते हैं ताके देश में फिर कभी दंगे-फसाद न हों। ये मज़हब ही है जो हम सब को एक दूसरे का दुशमन बना दिया है भले हम आपस एक-दूसरे के मित्र हों फिर भी दिल में नफरत होती है। आ औ हम सब जो गिनती के लोग हैं सब मज़हब से निकल कर एक होजाऐं, हमें प्यार चाहिये, दोसती भी चाहिये ताकि हम अमन से रह सकें।</p>
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		<title>By: Sanjay Bengani</title>
		<link>http://shuaibi.wordpress.com/2006/03/20/%e0%a4%ae%e0%a5%88%e0%a4%82-%e0%a4%ae%e0%a5%81%e0%a4%b8%e0%a4%b2%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%a8-%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a5%8b%e0%a4%82-%e0%a4%a8%e0%a4%b9%e0%a5%80%e0%a4%82/#comment-42</link>
		<dc:creator>Sanjay Bengani</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 21 Mar 2006 00:46:00 +0000</pubDate>
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		<description>शाबास शुएब. आज हालात ऐसे हैं कि किसी मुसलमान से ऐसे लेख कि उम्मीद नहीं थी. दुनियां को बेहतर बनाना हैं तो हमे मज़हबी ज़ंजीरो को तोडना होगा. वैसे मैं भी अपने पिताजी कि खुशी के लिए पूजा-पाठ करता हूं और वे मुझे नास्तिक हिन्दू मानते हैं.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>शाबास शुएब. आज हालात ऐसे हैं कि किसी मुसलमान से ऐसे लेख कि उम्मीद नहीं थी. दुनियां को बेहतर बनाना हैं तो हमे मज़हबी ज़ंजीरो को तोडना होगा. वैसे मैं भी अपने पिताजी कि खुशी के लिए पूजा-पाठ करता हूं और वे मुझे नास्तिक हिन्दू मानते हैं.</p>
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	<item>
		<title>By: Pratik</title>
		<link>http://shuaibi.wordpress.com/2006/03/20/%e0%a4%ae%e0%a5%88%e0%a4%82-%e0%a4%ae%e0%a5%81%e0%a4%b8%e0%a4%b2%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%a8-%e0%a4%95%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a5%8b%e0%a4%82-%e0%a4%a8%e0%a4%b9%e0%a5%80%e0%a4%82/#comment-41</link>
		<dc:creator>Pratik</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 20 Mar 2006 21:59:00 +0000</pubDate>
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		<description>शुऐब भाई, आपने मज़हब के बारे में विचारों को बड़ी साफ़गोई से व्यक्त किया है। इसके लिये आप निश्चय ही धन्यवाद के पात्र हैं। दिक़्क़त यह है कि लोग मज़हब को स्थिर (satatic) मान लेते हैं और इस वजह से वह रुढिवादिता से परिपूर्ण हो जाता है। अगर मज़हब को भी वक़्त की ज़रूरत के मुताबिक तब्दील किया जाए, तो वह हर युग में उपयोगी हो सकता है।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>शुऐब भाई, आपने मज़हब के बारे में विचारों को बड़ी साफ़गोई से व्यक्त किया है। इसके लिये आप निश्चय ही धन्यवाद के पात्र हैं। दिक़्क़त यह है कि लोग मज़हब को स्थिर (satatic) मान लेते हैं और इस वजह से वह रुढिवादिता से परिपूर्ण हो जाता है। अगर मज़हब को भी वक़्त की ज़रूरत के मुताबिक तब्दील किया जाए, तो वह हर युग में उपयोगी हो सकता है।</p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: Jitendra Chaudhary</title>
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		<dc:creator>Jitendra Chaudhary</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 20 Mar 2006 21:11:00 +0000</pubDate>
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		<description>शुऐब भाई,
माफ़ कीजिएगा, कमेन्ट करने मे काफी देर कर दी है। बहुत बहुत अच्छा लेख लिखा है आपने। सबसे अच्छी बात, आपकी ईमानदारी की।लेकिन शोएब भाई, जो बात आप अपने धर्म के लिये कह रहे है, वो दूसरे धर्मों पर भी लागू होती है।मै खुद कई कई बार कुछ सवालों/रुढिवादी परम्पराओं का जवाब ढूंढने की कोशिश करता हूँ, लेकिन अक्सर एक ही जवाब मिलता है &lt;B&gt;&quot;चुपचाप जो कहा जा रहा है, करो। कोई धर्म से ऊपर नही है, तुम भी नही&quot;&lt;/B&gt; कभी बड़ों के दबाव तो कभी किसी और वजह से सब करना पड़ता है। आज आपके विचार पड़े तो विचारों मे फिर से उबाल आ गया है।

बहुत सुन्दर लेख है। मै तो आपका मुरीद हो गया।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>शुऐब भाई,<br />
माफ़ कीजिएगा, कमेन्ट करने मे काफी देर कर दी है। बहुत बहुत अच्छा लेख लिखा है आपने। सबसे अच्छी बात, आपकी ईमानदारी की।लेकिन शोएब भाई, जो बात आप अपने धर्म के लिये कह रहे है, वो दूसरे धर्मों पर भी लागू होती है।मै खुद कई कई बार कुछ सवालों/रुढिवादी परम्पराओं का जवाब ढूंढने की कोशिश करता हूँ, लेकिन अक्सर एक ही जवाब मिलता है <b>&#8220;चुपचाप जो कहा जा रहा है, करो। कोई धर्म से ऊपर नही है, तुम भी नही&#8221;</b> कभी बड़ों के दबाव तो कभी किसी और वजह से सब करना पड़ता है। आज आपके विचार पड़े तो विचारों मे फिर से उबाल आ गया है।</p>
<p>बहुत सुन्दर लेख है। मै तो आपका मुरीद हो गया।</p>
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