सपनों में यात्रा शुरू
April 1, 2006
घर जाने के लिए और दस दिन बाकी हैं पर पिछले एक महीने से रोज़ रात को अजीब अजीब सपने आ रहे हैं। ख्वाब में अपने घर आ-जा रहा हूं। कभी मेरी फलईट मिस हो रही है, कभी बंगौर का टिक्ट नहीं मिल रहा और कभी बारिश की वजे से फलईट केन्सल हो रही है वगेरा वगेरा।
आज का ताज़ा तरीन ख्वाब ये है के एक मलबारी ने मुझ से कहा तुम कालीकट (केरला का शहर) क्यों नही चले जाते जिसका किराया भी बहुत कम है जहां से ट्रेन तुमहें सिर्फ पांच घंटों में बंगलौर पहुंचा देगी। पैसा बचाने के चक्कर में ख्वाब में ही दुबई से कालिक्ट पहुंचा और वहां से ट्रेन पकड कर बंगलौर जा रहा था के ट्रेन का एक्सीडंट हो गया सभी बोगियाँ अलग अलग होगई। ख्वाब ही में बड़बड़ाया कि कितना पागल हूं एक मलबारी के घटिया ईडिए पर कालीकट आ गया और मेरे साथ ही ऐसा होना था के ट्रेन का एक्सीडंट होगया।
अभी पिछले सप्ताह का ख्वाब है के घर पहुंचने के बाद अम्मी ने मेरा पासपोर्ट फाड फेंका बस बहुत होगया, अपने देश में सब कुछ है किया ज़रूरत है दूसरे मुल्कों में नौकरी करने की? फिर अब्बा से कहने लगीं फौरन शुऐब की शादी करवा दो वरना ये फिर दुबई भाग जाऐगा।
कहते हैं दिन भर हम जो भी करते हैं वही सपनों में नज़र आता है पर मेरे सपनों में मेरी ही आजीब आजीब फिल्में रेलीज़ होती हैं जो मैं ने कभी साईन नहीं किया।
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1.
Pratik | April 1, 2006 at 9:53 pm
सपने में ही सही, लेकिन आपके अब्बा ने बिल्कुल ठीक बात कही है। शायद इस बार बंगलौर पहुंचने पर वास्तव में ही आपके लिये कोई ‘प्रोग्राम’ बना रखा हो।
2.
SHUAIB | April 3, 2006 at 9:10 am
Pratik जीः
आपसे एक शिकायत ये है कि आप अपने ब्लॉग पर लिखते क्यों नहीं?–>
जनाब आप तोमुझे और भी डराने लगे