Archive for June, 2006

हमारा मौसम

UAE, दुनिया के सबसे गरम देशों मे से एक है, इस वकत यहां 45 डिगरी और साथ में तेज़ गरम हवा के झोंके बरदाश्त से बाहर है फिर भी यहां रशय, फ्रांस, हॉलेंड और दूसरे थंडे देशों के हज़ारों रोज़गार और कारोबारी लोग रहते हैं पता नहीं वो कैसे यहां की गरमी बरदाश्त करते होंगे? 45 डिगरी कोई बडी बात नहीं, कभी कभी काटा 50 डिगरी के ऊपर भी चला जाता है, बडी और गम्भीर बात तो यहां की गरम हवा है। बीस कदम आगे चलो तो आदमी पसीने मे पूरा भीग जायेगा, दिन मे दो बार नहाऐं तो भी कम है और उस पर से नलों मे पानी भी खवलता हुवा आयेगा। UAE के सिर्फ दो मौसम होते हैं एक सम्मर दूसरा तेज़ और तूफानी हवाऊँ का मगर यहां कभी बरसात तो दूर की बात छींटे और बोछाडें तक नहीं टपकतीं। वो तो शुक्र है पिछले वर्ष सोनामी के वकत यहां अचानक चंद बूंदें टपक पडीं वरना बरसात और वो भी दुबाई में, कभी नहीं। कभी कभी आसमान को देख कर लगता है कि आज बरसात होगी, और हमेशा ऐसा ही होता कि बरसात तो किया एक बूंद भी नहीं टपकती।

ये बरसात के आसार नही बलकि आस पास रेगिसतान मे ज़बरदस्त आंधी की वजे से दुबई के कुछ इलाके धूल - मिट्टी की लिपेट मे हैं।


4 comments June 30, 2006

चश्मा

मेरी नज़र कमजोर तो नही फिर भी पिछले आठ वर्षों से चश्मे के बगैर क्म्प्यूटर की स्क्रीन को नही देख सकता और अगर किसी दिन अपना चश्मा घर भूल आया तो दफतर मे कुछ काम नही कर सकता, अब तो चश्मा मेरी रोजी रोटी बन गया है क्योंकि क्म्प्यूटर के सिवा मुझे दूसरा कोई काम नहीं आता और चश्मे के बगैर क्म्प्यूटर चला नहीं सकता। मैं चश्मे के बगैर अखबार पढ सकता हूं, अँधेरे मे भी कुछ कुछ देख सकता हूं मगर टीवी, सिनेमा और क्म्प्यूटर की स्क्रीन नहीं देख पाता। अब तो क्म्प्यूटर पर गारमंट (Fabric) डिज़ाईन कर रहा हूं जो बहुत ही बारीकी का काम है यानी और ज्यादा नज़र कमजोर होने का काम है।


2 comments June 25, 2006

दुबाई मे हंगामा

बालिवूड के सभी सितारे इस वकत दुबाई मे जगमगा रहे हैं। यहां तो हर सप्ताह बालिवूड से कोई ना कोई आता रहता है और परदेस मे रहने वाले भारतियों को खुश करके लाखों रुपया लूट लेजाता है। मगर इस बार बालिवूड के सभी सितारे एक साथ दुबाई मे नज़र आने लगे, यहां के भारतियों को लूटने और खुश करने के लिए नहीं बल्कि IIFA एवार्डस लूटने आऐ हैं। अमिताभ से लेकर फरदीन तक, आश से लेकर रानी तक सब यहीं हैं। दो वर्ष पहले Zee एवार्डस के वकत भी यहां ऐसी ही रोनक लगी थी जो अब दुबारा देखने को मिल रही है। वैसे भारती तो बालिवूड के दीवाने मगर पाकिस्तानी ज़रूरत से कुछ ज़ियादा ही दीवाने हैं।



1 comment June 18, 2006

कयामत ऐसी थी

शाम को होटल मे बैठे नाश्ता कर रहा था, अचानक होटल के बाहर चीखने चिल्लाने की आवाज़ें आऐं। मैं समझा कोई नई बात नहीं कुछ हादिसा हुवा होगा। अब तो अरबी ज़ुबान में नारे बाज़ी शुरू होगई, होटल के सामने ट्राफिक जाम। अन्दर बैठे चंद लोग माजरा देखने बाहर निकले तो मैं भी जल्दी से हाथ धो कर बाहर आगया। कुछ सम्झ मे नहीं आरहा के आखिर यहां हुवा किया? आस पास के इमारतों मे मौजूद लोग वो भी तमाशा देखने अपनी बालकोनियों में आकर खडे होगए। आरब लडके सीटियाँ बजाते नारे कोस रहे थे “या शबाब, या शबाब” (हए किया जवानी है) चंद खूबसूरत आरबी लड़कियॉ बिलकुल छोटे छोटे कपडे पहन कर जा रही थीं लेकिन आस पास के माहोल को देख कर लगा जैसे यहां कोई कयामत होगई हो। यहां अकसर आरब लडके कार चलाते हुवे कभी पानी मे उतर जाते है तो कभी किसी पर अपनी गाडी ठोक देते हैं। किसी भी लडकी को देख कर ऐसे दीवाने बन्ते हैं जैसे ज़िनदगी में पहली बार देख रहे हों।


3 comments June 12, 2006

मां, भूक लगी है

ये शब्द सुनते ही मां की ममता तडप उठती है वो किचन की ओर डोडती है और कोशिश करती है कि जल्दी से उसके लाडले के लिए खाना गरम करे। हम जब स्कूल से वापस घर आते हैं किताबें एक तरफ डाल कर आराम से सोफे पर बैठ कर चिल्लाते हैं “मां भूक लगी है जल्दी से खाना दे” मां झट से खडी होजाती है भले वो बीमार हो, और प्यार से कहती है “हाथ मुंह धोले बेटा अभी खाना लगाती हूं।”

यहां परदेस में मां बहुत याद आती है और साथ में अपना बचपन भी।

बरसात में भीगो तो डांटना फिर तोलिये से हमारा सर पोंछना, सुबह सवेरे हमें जगाना ज़िद करो तो कमबल खींच लेना। बीमारी में ज़बरदसती हमारे मुंह में दवाई ठोसना और आधी रात को उठ कर हमारी कमबल सीधी करना। जल्दी जल्दी नाश्ता बनाए साथ ही पलट कर बाथ रूम में हमारी पीठ पर साबुन भी मलदे। स्कूल से घर देर से लोटें तो दरवाज़े पर हमारी राह देखते परेशान खडी रहना। शरारत पर पिटाई करना और अच्छे काम करो तो हमारे सर पर प्यार से हाथ फेरना। पिता पिटाई करे तो मां हमें सीने से लगा लेती है और जब वो खुद हमें पीटती है गुस्सा थनडा होने पर दुबारा हमें सीने से लगा लेती है। पिता गुस्से में आकर औलाद को घर से निकाल दे पर मां अपने बच्चों की खुशी के लिए खुद घर छोड देती है। बाप के कतल के एलज़ाम में कानून बेटे को सज़ा देता है पर मां अपना सुहाग उजाडने वाले बेटे को माफ करदेती है। उसके बच्चों का सुख अपना सुख, उसके बच्चों का दर्द अपना दर्द, उसके बच्चों की परेशानी अपनी परेशानी और खुद अपना दुख भुलाने के लिए कोने बैठ कर रोती है। वो अपने बच्चों को खाना खिलाने तक चैन से नहीं बैठती, लोग कहते हैं मां भगवान का रूप है लेकिन मैं कहता हूं मां ही भगवान है।


5 comments June 6, 2006


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