खुदा से मिलो
July 12, 2006
मैं ने अपने उर्दू ब्लॉग पर “खुदा से मिलो” नामक अब तक 21 लेख पोस्ट किये हैं, जिसका मतलब है “खुदा अमेरिका का मेहमान” (America, the host of Lord) और उसी पार्ट का आठवां लेख यहां हिन्दी मे पोस्ट कर रहा हुँ। हुवा यूँ कि नया वर्ष 1 जनवरी 2006 के दिन दुनिया भर से खुदा के नाम नये वर्ष की मुबारकबाद पत्र भेजे और उसामा बिन लादिन ने भी खुदा के नाम पत्र और साथ ही अपना ताज़ा वीडियो भेजाः
खुदा ने मुबारकबादियोँ का आख़िरी पार्सल खोला तो उसामा का वीडियो पाया जिस मे वो बन्दूक थामे उनकी रिवायती खबरदार उंगली खुदा की तरफ थीः तमाम तारीफें अमेरिका के लिऐ जो बहुत ही गज़बनाक और दुनिया का चौकीदार है, वो इस लिऐ कि हमारा शक यकीन बन गया, खुदा के चाल चलन से साफ ज़ाहिर है वो भी अमेरिकी हामी है। अमेरिका को नज़रे रहमत से देखने वाले खुदा, इतना तो बतादे कि आखिर हमें कौनसा मज़हब इखतियार करना होगा? अपने को माता पिता की विरासत मे मज़हब मिला और मज़हबी तालीम हम पर फर्ज़ होगई और जब फारिग होये तो ज़हनियत ऐसी मनहूस हुई के दूसरे मज़हबी इनसानों से नफरत जगाली। लिबास तबदील किया, गले मे खारिश के बावजूद छाती तक दाढी छोडी फिर जन्नत मे सबसे आला मुकाम पाने के चक्कर मे जिहाद करने का पेशा अपनाया मगर इसके बावजूद आज तक हम बे इज़्ज़त रहे। दुनिया के सभी देश एक होकर हमें नाकों चने चबा रहे है, हम तस्व्वुर करते ही रह गये कि एक ना एक दिन गैबी इमदाद नसीब होगी मगर हमेशा मूँ की खानी पडी। दुनिया भर मे हमारे मुजाहिदीन को चुन चुन कर कुत्तों की तरह मार रहे हैं, इन मरे हुए मुजाहिदीन को शहीद कहते हुए शर्म आती है इनके चेहरे पहचानने लायक भी नहीं छोडते, शहीदों को जन्नत नसीब है मगर खुदा खुद अमेरिका मे जा बसा है। किस्से कहानियों मे हमेशा जिहाद की जीत लिखा है और हम ने जहां कहीं भी जिहाद किया रुसवाई नसीब हुई। काश आप खुदा कि बजाये एक मुजाहिद होते, क्योंकि एक मुजाहिद ही दूसरे मुजाहिद का दर्द समझता है। हम इस वकत बहुत ही कनफियोज़न का शिकार हैं, पहले तो अपने आपको बहुत बडा मुजाहिद समझ लिया, चंद लोगों ने होसला किया बढाया खुद को वालियों मे तस्व्वुर कर बैठे हमे किया मालूम था कि दुनिया वाले हमारे इस पवित्र पेशे को आतंकवाद सम्झते है? बडी मेहरबानी ज़रा बताऐँ कि आखिर ये कौनसा सिसटम है? कुछ समझ मे नहीं आरहा कि आखिर हमारी ज़िनदगी का किया मकसद है —— (उसामा के आंसू निकल पडे और खुदा से कहने लगे) आपने हमें इनसानियत के अज़ीम मुकाम से निलाक कर मज़हब मे फेंक दिया फिर हम ने ऐसा कौनसा गुनाह किया कि जिहाद जैसे खून खराबा ग्रुप का लीडर बना दिया जहां रुसवाई शर्मिन्दगी और लाचारगी के अलावा आखिर मे बहुत बुरी मौत है —- जब हमें मुजाहिद बना ही दिया तो जानवर बन्ने मे ज़्यादा देर नहीं, किया खाख ज़िनदगी पाई काश हमें जानवर ही बना देते या फिर इनसानों मे पैदा ही ना होते तो आज हमारी ये दुरगत ना बनती ——- (उसामा ने अपने आंसू पुंछे और खुदा की तरफ घूरते होवे कहा) इस वीडियो कैसेट से आज इकरार करता हूँ अमेरिका पर ईमान लाता हूँ और बाकी ज़िनदगी इनसानों की तरह जीना चाहता हूँ — आगे और भी
बाकी फिर कभी
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1.
सागर चन्द नाहर | July 12, 2006 at 4:10 am
सुहैब भाई
काश यह सब सच हो जाता।
2.
आशीष | July 12, 2006 at 11:32 pm
शोयेब भाई,
अपने सभी उर्दू पोष्ट एक एक करके हिन्दी मे पोष्ट कर दें, वैसे मैन उर्दू पढ नही सकता लेकिन समझ जरूर लेता हूं