फिर रमज़ान आया

September 23, 2006

हर वर्ष दुबई मे शॉपिंग फेसटिवल मनाया जाता है और शारजाह मे रमज़ान का फेसटिवल मनाने की रिवायत है मानो मुखतलिफ फेसटिवलों को इस देश के सात राष्ट्रों ने आपस मे बांट रखा है। कोई भी फेसटिवल हो मकसद एक ही है पैसा कमाना और दबा कर कमाना।

आज रमज़ान का पहला दिन है, यहां पूरे शारजह शहर को दुल्हन की तरह सजा दिया, जगह जगह मेले भी लगे हैं और हर मेले मे वही चैनीज़ आइटम्स, कपडे, अनोखे सिगार, सिगरेट, झूले झमके वगैरह वगैरह। सुबह से शाम तक पूरे UAE मे खाने की दुकानों होटलों वगैरह सब बंद रहते हैं - सभी मुसलमानों को रोज़ा रखने का हुकम है और गैर मुस्लिम लोग सिर्फ अपने घर पर ही खा सकते हैं। रमज़ान का पूरा महीना होने तक अगर कोई रास्ते मे सडकों, पार्कों आदी जगहों मे कुछ खाया पिया तो उसे पुलिस पकड ले जाती है फिर जुर्माना भी मांगती है या फिर छोटी मोटी सज़ा भुगतनी पडेगी। गैर मुसलिम अगर फैमली वाला हो तो खैर मगर बैचलर्स लोग जिन्हें खाना पकाना नही आता और वोह लोग जो सिर्फ होटलों से खाते हैं, उन बेचारों को मुसलमानों की तरह शाम तक भूका रह कर होटलों के खुलने का इनतेज़ार करना पडेगा।

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8 Comments Add your own

  • 1. PRABHAT TANDON  |  September 23, 2006 at 10:15 am

    शुएब भाई,
    सबसे पहले तो रमजान मुबारक। खाने पीने का इन्तजाम कुछ कर लो, मै आप की मुसीबत समझ सकता हूँ, भूख ज्यादा ही लगती होगी इन दिनो।

  • 2. SHUAIB  |  September 23, 2006 at 10:44 am

    सच कहते हो प्रभात भाई - इन दिनों भूक कुछ ज़यादा ही लगती है :(

  • 3. संजय बेंगाणी  |  September 23, 2006 at 11:18 am

    रमजान की मुबारकबाद. भुख की समस्या तो हैं, कुछ इंतजाम कर लो भाई. उसके बाद उत्सव हैं, मजे करो.
    आजसे यहाँ भी धुम हैं. गरबो की रौनक से राते रोशन होगी.

  • 4. pankaj बेंगाणी  |  September 23, 2006 at 11:21 am

    यार ये नियम गलत हैं। होटल तो चालु रहने चाहिए… जो सचमुच मे रोजा रखना चाहेंगे वो थोडे ही खाने वाले हैं। पर दुसरे लोगों का तो ध्यान रखना चाहिए ना।

    जबरदस्ती काहे करते हैं….

    लेकिन बात वही कट्टरता की है… क्या करें? कोई ईलाज नहीं। अच्छा है मै दुबई नही रहता… मै तो भूखा नही रह सकता…

  • 5. मनीष  |  September 23, 2006 at 1:30 pm

    रमजान के शुभारंभ की मुबारकबाद ! शाम को ही खाइए पर दबा कर खाइए ।

  • 6. राही  |  September 23, 2006 at 7:01 pm

    शुऍब भाईजान,
    रमजान की मुबारकबादें.
    क्यों न आप भी इस कानुन के होने का फायदा उठायें और इसे भुखा रहने कि सजा मानने की बजाय पुण्य कमाने और उससे भी बड़ा शरीर की सहनशक्ति बढ़ाने का मौका मानें. (मालुम है ऐसा कहना सिर्फ उपदेश देने वाली बात है, पर फिर भी … ;)

  • 7. rachanabajaj  |  September 24, 2006 at 9:03 am

    ओह शुएब भाई, आपने ये जानकारी देकर हमारी चिन्ता को बढा दिया है!!

  • 8. आशीष  |  September 25, 2006 at 3:49 am

    शुएब भाई ,रमजान की मुबारकबाद.

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