दिन मे प्लेन गिनना

October 11, 2006

हमारी छत के ऊपर बिलकुल करीब से हर 3 मिनट पर हर देश का हवाई जहाज़ उतरता है वो इस लिए के एरपोर्ट बिलकुल पास मे है। और हर पांचवें प्लेन की आवाज़ इतनी भयानक होती है जैसे ये अपने घर पर ही उतरे गा। कल शाम को बाहर कहीं जाने के लिए गेट खोला ही था कि नज़रों के बिलकुल सामने ऐर-इन्डिया कान फाडते हुए आया। पहले तो एक पल के लिए दिल मे खुशी की लहर दौड़ पडी क्योंकि विदेश मे अपने देश का हवाई जहाज़ आंखों के सामने था – जब वो बहुत ही नीचे यानी अपने सर पर ज़ोरदार आवाज़ से आया तो लगा कि ये अपने सर पर यकीनन गिरने ही वाला है। दिन भर यहां से दर्जनों प्लेन उतरते हैं और एक ही तरीके से सीधा उतर हैं मगर ये हमारा  ऐर-इन्डिया कुछ ज़्यादा ही नीचे से उतरा – फिर खयाल आया आखिर अपने ही देश का प्लेन है, कैसे भी उतरे उसकी मर्ज़ी और शायद उसके पाइलट सरदारजी होंगे जो सबसे अलग ही उतर रहे थे।

पिछले सप्ताह हम सब लोग शारजाह छोड दुबई चले आए – हर दिन शारजाह से दुबई आते-जाते थक चुके थे। हमारी कम्पनी ने हम लोगों का Accommodation जो पिछले चार वर्षों से खूबसूरत शहर शारजाह मे था अब दुबई मे शिफ्ट कर दिया और वो भी शहर से दूर ऐरपोर्ट के पीछे जहां बस और टैक्सी भी नही, एकदम बडी बडी सडकें, दूर दूर तक होटल और खने पीने की दुकानें तक नही – हर तरफ बडे बडे आलिशान Villas यहां सब अमीर लोग रहते हैं और इनके बीच मे हम बेचारों को डाल दिया। ना साइबर केफे है ना रेस्टुरंट। हमारे एक मित्र जो अपनी फेम्ली के साथ शारजाह ही मे रहते हैं, उन्हों ने मुझ से मज़ाक मे पूछाः जब वहां कुछ नही तो शाम को आफिस से आकर घर पर क्या करते हो? मैं ने जवाब दियाः हवाई जहाज़ गिनते हैं, कौनसे देश का कितवां प्लेन है।

Entry Filed under: दुबई. .

12 Comments Add your own

  • 1. इदन्नम्म  |  October 11, 2006 at 9:43 am

    गिनते रहो शुएब भाई, टोटल करके हमें भी बता देना।

  • 2. SHUAIB  |  October 11, 2006 at 9:58 am

    अरे यार तुम मज़ाक कर रहे हो या सच मुच टोटल करके बताना है।

  • 3. pankaj बेंगाण&hellip  |  October 11, 2006 at 11:18 am

    भाई मेरी सहानुभुति….. क्या उपाय पापी पेट क्या क्या करवाता है

  • 4. PRABHAT TANDON  |  October 11, 2006 at 12:23 pm

    अरे शुएब , शुक्र करो खुदा का कि प्लेन गिन रहे हो , तारे नहीं,। अगर तारे गिनते तो क्या हालत होती।

  • 5. सागर चन्द&hellip  |  October 11, 2006 at 12:52 pm

    किस्मत वाले हो शुऐब भाई कि प्लेन गिन रहे हो वरना लोग तो मक्खियाँ गिना करते हैं।

  • 6. आशीष  |  October 11, 2006 at 1:12 pm

    शुयेब भाई, प्लेन गिनना बढिया तरिका है, अगले हफ्ते जब बोर हो जाओगे तब स्टैण्डिग वाले यात्री गिनना शुरू कर देना।

    ध्यान रहे एअर होस्टेस को आंख नही मारना, उसे दिखायी नही देगा !

  • 7. समीर लाल  |  October 11, 2006 at 1:28 pm

    सही है, और कुछ नहीं तो गिनती में तो महारत हासिल कर ही लोगे. :)
    एक लिस्ट भी बना लो, कौन से देश के कितने आये, उससे भी समय अच्छा कटेगा.

  • 8. समीर लाल  |  October 11, 2006 at 1:29 pm

    सही है, और कुछ नहीं तो गिनती में तो महारत हासिल हो ही जायेगी. :)
    एक लिस्ट भी बना लो, कौन से देश के कितने आये, उससे भी समय अच्छा कटेगा.

  • 9. संजय बेंग&hellip  |  October 11, 2006 at 2:15 pm

    भैये प्लेन गिनो या तारे पर पास में साइबर कैफे नहीं हैं तो अपना चिट्ठा-विट्ठा का कामकाज तो बाधित नहीं होगा ना. यह ज्यादा जरूरी हैं. ;)

  • 10. नितिन बाग&hellip  |  October 11, 2006 at 3:04 pm

    मैं क्या कहूँ…यही कहूँगा…
    दुनिया में कितना गम है…मेरा गम कितना कम है
    ;)

  • 11. राकेश खंड&hellip  |  October 12, 2006 at 12:53 am

    अब जुमेरा बीच इतनी दूर तो नहीं
    और बुर्ज अल अरब भी है वहीं कहीं
    शुक्र, शारजाह से गये नहीं अजमान
    तीन से आगे वरन गिनती बढ़े नहीं

  • 12. SHUAIB  |  October 12, 2006 at 5:33 am

    @राकेश जीः
    जुमेरा पास होते भी वहां जाने को टाइम नहीं
    हां शुक्र है शारजाह से अजमान हम गए नहीं :)
    पहले तो ट्राफिक मे फंसने की हमें आदत नहीं
    अब ट्राफिक मे फंसने के सिवा दूसरा चारा नहीं

    शारजाह से जुमेरा दस दिर्हम मे चले जाते थे
    अब अपने घर से जुमेरा ५० दिर्हम से कम नहीं :(

    @ नितिन बागला जी
    हमारे गम मे शरीक होने के लिए आपका धन्यवाद।

    @ संजय बेंगाणी
    अरे यार कल रात बहुत दूर तक पैदल चलने के बाद एक साइबर केफे मिला जहां एक घंटा इन्टरनेट के Dhs. 7 हैं, मतलब 87.50 भारती :(

    @ समीर लाल
    समीर जी सलाह देने का शुक्रिया :) अब टाइम पास के लिए मैं ने दुबारा अपने कमप्यूटर पर html और Java पर हाथ साफ कर रहा हूं।

    @ आशीष आप भी अच्छा मज़ाक कर लेते हैं ;) भाई, यहां अपने घर से स्टैण्डिग वाले यात्री और एअर होस्टेस दिखाई नही देते – और रही बात आंख मारने की, अरे यार आंख मारने के लिए यहां चिडया और कव्वा तक नही है :(

    @ सागर चन्द नाहर
    ठीक कहते हो भाई के मैं किसमत वाला हूं – कम से कम प्लेनों की गिनती कर रहा हूं ;)

    @ PRABHAT TANDON
    भाई आप ठीक कहते हो कम से कम प्लेन गिन रहा हूं और भला आज तक किसी ने तारे गिने हैं।

    @ pankaj बेंगाणी
    भाई आपकी बात तो बिलकुल सच्ची है – मगर आपकी टिप्पणी पढ कर लगा की मुझे तपाने के लिए वैसा लिखा है ;)

Leave a Comment

Required

Required, hidden

Some HTML allowed:
<a href="" title=""> <abbr title=""> <acronym title=""> <b> <blockquote cite=""> <cite> <code> <pre> <del datetime=""> <em> <i> <q cite=""> <strike> <strong>

Trackback this post  |  Subscribe to the comments via RSS Feed


Recent Posts

 

October 2006
M T W T F S S
« Sep   Nov »
 1
2345678
9101112131415
16171819202122
23242526272829
3031  

a

Recent Comments

RAVI on Happy Valentain day
suresh on ये खुदा है – 34
wap on मैं शहीद हों
नीरज दीवान on मैं मुसलमान क्यों नहीं
दिनेशराय द्विवेदी on मूंह मीठा करें

इनसे मिलो

My Links

Meta

Archives

Feeds