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	<title>Comments on: ये खुदा है - 36</title>
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	<description>MY HINDI BLOG</description>
	<pubDate>Fri, 09 May 2008 17:43:44 +0000</pubDate>
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		<title>By: PRABHAT TANDON</title>
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		<dc:creator>PRABHAT TANDON</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 26 Oct 2006 23:15:13 +0000</pubDate>
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		<description>हर बार की तरह यह पोस्ट भी अनूठी लगी। व्यंग -2 मे आपने शुएब बहुत कुछ कह डाला जो समझने वालों के लिये बहुत है। आप जैसा लिखते हैं वैसा ही लिखते जाइये।
धर्म के ठेकेदारों ने अपनी नाक को प्रतिष्ठा का प्रश्न बनते हुये इस बार भी ईद का मजा किरकिरा कर दिया। इस संदर्भ मे मौलाना कल्बे सादिक का बयन गौरतलब है। वह कहते हैं कि अब मुसिलिम उलेमाओं को चाँद की ओर देखना छोड कर खगोलशासित्रयों की भविष्यवाणियों की ओर धयान देना चाहिये। वैसे सही मायने मे अनुराग ने लिखा,"मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है, त्योहार मनाने का कारण है रोज़मर्रा की जिंदगी में थोड़ा बदलाव लाना। एक दिन के लिये 9 से 5 वाला चक्र तोड़ कर अपनी मस्ती में रम जाना, मद मस्त हो जाना - मानो कि बस पी रखी हो। अब चांद देख कर यह अहसास आये या बिना देखे या शायद ‘उनका’ चांद सा चेहरा देख कर आये। उद्देश्य तो मात्र यह है कि भैया एक दिन की छुट्टी तेरी मेरी खुट्टी (काम से) ।"</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>हर बार की तरह यह पोस्ट भी अनूठी लगी। व्यंग -2 मे आपने शुएब बहुत कुछ कह डाला जो समझने वालों के लिये बहुत है। आप जैसा लिखते हैं वैसा ही लिखते जाइये।<br />
धर्म के ठेकेदारों ने अपनी नाक को प्रतिष्ठा का प्रश्न बनते हुये इस बार भी ईद का मजा किरकिरा कर दिया। इस संदर्भ मे मौलाना कल्बे सादिक का बयन गौरतलब है। वह कहते हैं कि अब मुसिलिम उलेमाओं को चाँद की ओर देखना छोड कर खगोलशासित्रयों की भविष्यवाणियों की ओर धयान देना चाहिये। वैसे सही मायने मे अनुराग ने लिखा,&#8221;मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है, त्योहार मनाने का कारण है रोज़मर्रा की जिंदगी में थोड़ा बदलाव लाना। एक दिन के लिये 9 से 5 वाला चक्र तोड़ कर अपनी मस्ती में रम जाना, मद मस्त हो जाना - मानो कि बस पी रखी हो। अब चांद देख कर यह अहसास आये या बिना देखे या शायद ‘उनका’ चांद सा चेहरा देख कर आये। उद्देश्य तो मात्र यह है कि भैया एक दिन की छुट्टी तेरी मेरी खुट्टी (काम से) ।&#8221;</p>
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		<title>By: गिरिराज जोशी</title>
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		<dc:creator>गिरिराज जोशी</dc:creator>
		<pubDate>Wed, 25 Oct 2006 11:25:59 +0000</pubDate>
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		<description>बहुत खूब शुएब भाई.

ईद मुबारक!!!</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>बहुत खूब शुएब भाई.</p>
<p>ईद मुबारक!!!</p>
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		<title>By: जगदीश भाटिया</title>
		<link>http://shuaibi.wordpress.com/2006/10/24/%e0%a4%af%e0%a5%87-%e0%a4%96%e0%a5%81%e0%a4%a6%e0%a4%be-%e0%a4%b9%e0%a5%88-36/#comment-408</link>
		<dc:creator>जगदीश भाटिया</dc:creator>
		<pubDate>Wed, 25 Oct 2006 09:36:25 +0000</pubDate>
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		<description>चांद के मामले मे भी राजनीति होती है, कमाल है भाई !! त्योहार तो मिलजुल कर एकमत से मनाना चाहिये।
अच्छा लिखा है :)</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>चांद के मामले मे भी राजनीति होती है, कमाल है भाई !! त्योहार तो मिलजुल कर एकमत से मनाना चाहिये।<br />
अच्छा लिखा है <img src='http://s.wordpress.com/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' /></p>
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	<item>
		<title>By: Tarun</title>
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		<dc:creator>Tarun</dc:creator>
		<pubDate>Wed, 25 Oct 2006 03:06:31 +0000</pubDate>
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		<description>शुएब, ईद का भाषण सही दिये हो, अभी अभी प्राप्त समाचारों के अनुसार बुखारी को चांद अचानक पहले दिख गया।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>शुएब, ईद का भाषण सही दिये हो, अभी अभी प्राप्त समाचारों के अनुसार बुखारी को चांद अचानक पहले दिख गया।</p>
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		<title>By: अनूप शुक्ला</title>
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		<dc:creator>अनूप शुक्ला</dc:creator>
		<pubDate>Wed, 25 Oct 2006 02:53:11 +0000</pubDate>
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		<description>बहुत  खूब भाई. आपके लेखों में तो कबीर की आत्मा और परसाई जी की अंतरराष्ट्रीय समझ का अंश दिखता है.आपको ईद मुबारक</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>बहुत  खूब भाई. आपके लेखों में तो कबीर की आत्मा और परसाई जी की अंतरराष्ट्रीय समझ का अंश दिखता है.आपको ईद मुबारक</p>
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	<item>
		<title>By: अनूप शुक्ला</title>
		<link>http://shuaibi.wordpress.com/2006/10/24/%e0%a4%af%e0%a5%87-%e0%a4%96%e0%a5%81%e0%a4%a6%e0%a4%be-%e0%a4%b9%e0%a5%88-36/#comment-405</link>
		<dc:creator>अनूप शुक्ला</dc:creator>
		<pubDate>Wed, 25 Oct 2006 02:52:47 +0000</pubDate>
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		<description>बहुत  खूब भाई. आपके लेखों में तो कबीर की आत्मा और परसाई जी की अंतरराष्ट्रीय समझ का अंश दिखता है</description>
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		<title>By: अनुराग श्रीवास्तव</title>
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		<dc:creator>अनुराग श्रीवास्तव</dc:creator>
		<pubDate>Wed, 25 Oct 2006 02:12:33 +0000</pubDate>
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		<description>चाँद दिखा या चाँद नहीं दिखा इस चक्कर में आजकल सारे त्योहार दो दो दिन मना लिये जाते है। हमको यह ज़हमत नहीं उठानी पड़ती

दिल के आसमान पर तस्वीर टांग कर तेरी
रात दिन तुमको देखा करते हैं
साल के दिन तो आते जाते हैं
हम तो हर दिन ही ईद करते हैं।

वैसे डा बच्चन ने 'मधुशाला' में कुछ यूं कहा है

"एक बरस में एक बार ही जलती होली की ज्वाला
एक बार ही लगती बाज़ी जलती दीपों की माला
दुनिया वालों किंतु किसी दिन आ मदिरालय में देखो
दिन को होली रात दिवाली रोज़ मनाती मधुशाला"

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है, त्योहार मनाने का कारण है रोज़मर्रा की जिंदगी में थोड़ा बदलाव लाना। एक दिन के लिये 9 से 5 वाला चक्र तोड़ कर अपनी मस्ती में रम जाना, मद मस्त हो जाना - मानो कि बस पी रखी हो। अब चांद देख कर यह अहसास आये या बिना देखे या शायद 'उनका' चांद सा चेहरा देख कर आये। उद्देश्य तो मात्र यह है कि भैया एक दिन की छुट्टी तेरी मेरी खुट्टी (काम से) ।

शुऐब, आप लिखते दिल खोल कर हैं - बधाई!</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>चाँद दिखा या चाँद नहीं दिखा इस चक्कर में आजकल सारे त्योहार दो दो दिन मना लिये जाते है। हमको यह ज़हमत नहीं उठानी पड़ती</p>
<p>दिल के आसमान पर तस्वीर टांग कर तेरी<br />
रात दिन तुमको देखा करते हैं<br />
साल के दिन तो आते जाते हैं<br />
हम तो हर दिन ही ईद करते हैं।</p>
<p>वैसे डा बच्चन ने &#8216;मधुशाला&#8217; में कुछ यूं कहा है</p>
<p>&#8220;एक बरस में एक बार ही जलती होली की ज्वाला<br />
एक बार ही लगती बाज़ी जलती दीपों की माला<br />
दुनिया वालों किंतु किसी दिन आ मदिरालय में देखो<br />
दिन को होली रात दिवाली रोज़ मनाती मधुशाला&#8221;</p>
<p>मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है, त्योहार मनाने का कारण है रोज़मर्रा की जिंदगी में थोड़ा बदलाव लाना। एक दिन के लिये 9 से 5 वाला चक्र तोड़ कर अपनी मस्ती में रम जाना, मद मस्त हो जाना - मानो कि बस पी रखी हो। अब चांद देख कर यह अहसास आये या बिना देखे या शायद &#8216;उनका&#8217; चांद सा चेहरा देख कर आये। उद्देश्य तो मात्र यह है कि भैया एक दिन की छुट्टी तेरी मेरी खुट्टी (काम से) ।</p>
<p>शुऐब, आप लिखते दिल खोल कर हैं - बधाई!</p>
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		<title>By: Pratik Pandey</title>
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		<dc:creator>Pratik Pandey</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 24 Oct 2006 18:32:53 +0000</pubDate>
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		<description>बहुत खूब शुऐब भाई। लगता है ख़ुदा का भाषण खुद जॉर्ज बुश ने लिखा था।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>बहुत खूब शुऐब भाई। लगता है ख़ुदा का भाषण खुद जॉर्ज बुश ने लिखा था।</p>
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