ये भारत है जनाब !!!

October 27, 2006

क्या अजीब देश है हमारा, यहां कभी त्योहार खतम होने का नाम ही नही लेते कभी दीपावली की खरीदारी तो कभी रमज़ान की गहमा गहमी, कभी दशहरा तो कभी दुर्ग पूजा। पिछले चंद महीनों मे त्योहारों का जैसे एक सिलसिला चल रहा है। पहले तो पूरे भारत मे दशहरा की धूम धाम थी और लोगों ने रावन को जला कर चैन का सांस लिया ही था कि दिपावली और रमज़ान की तैयारियाँ और शुरू होगई।

रात के बारह बजते ही जहां पूरी दुनिया सोजाती है लेकिन इस वक्त रमज़ान और दिपावली के मौके पर पूरे भारत मे सवेरा हो जाता है – लोगों की चहल पहल की वजह से बाज़ारों मे रौनक लग जाती है। इस बार दिपावली के साथ रमज़ान का भी समाँ था, पूरे बाज़ार खरीदारी के लिए खचाखच भरे हुए, भारत मे इन त्योहारों के मौके पर कौन हिन्दू और कौन मुसलमान पहचानना मुश्किल है क्योंकि सभी भारतीयों का एक-दूसरे के त्योहारों मे आना-जाना और मुबारकबादी देना ज़रूरी है और तो और एक-दूसरे के घरों मे खाना भी खाते हैं और ये नज़ारा चंद नेता लोगों से हज़म नही होता, जैसे ही त्योहारों का मौसम खतम हुआ फिर दंगा फसाद शुरू करवा देते हैं – वाह क्या कल्चर है हमारा!

भारत कोई ऐसा वैसा देश नही जहां हिन्दू-मुसलमानों के बीच सिर्फ दंगे ही होते हैं – भारत के हिन्दू और मुसलमान अपस मे लडते ज़रूर हैं मगर एक दूसरे के बगैर रह भी नही सकते। वैसे तो मैं सिर्फ नाम का मुसलमान हूं और हर दिन मुसलमानों मे उठता बैठता हूं लेकिन अपने देश के कल्चर को ही अपना धर्म और भारत को अपनी मां सम्मान मानता हूं। मैं ने हमेशा से हिन्दू को हिन्दू नहीं बल्कि अपना भाई माना है हालांकि दंगों के वक्त अपने हिन्दू भाईयों से मार भी खा चुका हूं। खैर दंगे फसाद के मौके पर कौन क्या है दिखाई नही देता और ये दंगा फसाद तो हमारे देश मे रोज़ का मामूल है, फसाद किसी भी टाइप का हो मगर भुगतने वाला कोई, पकडा जाने वाला कोई, मरने वाला कोई लेकिन फसाद मचाने वाला आज़ाद – नेता लोग को कौन पकडे? जबकि पकडने,  मारने और फसाद मचाने का आर्डर तो वही देते हैं।

यहां दुबई मे कहने को बहुत सारे दोस्त हैं मगर अपना जो सच्चा दोस्त है वो एक हिन्दू है, ज़रूरतों पर काम आने वाला, खुशी और दुःख मे साथ देने वाला हालांकि वो अभी तक मुझे मुसलमान ही समझता है फिर भी अपनी सच्ची दोस्ती निभाता है। हम पिछले चार वर्षों से साथ हैं लेकिन आज तक उस ने मुझ से ये नही पूछा कि दूसरे मुसलमानों की तरह तू नमाज़ क्यों नही पढता? जबकि मैं ने उस से पूछ डाला तू पूजा पाठ क्यों नही करता? उसने जवाब दियाः “हालांकि मेरे माता-पिता हिन्दू हैं और पूजा भी करते हैं लेकिन जब से मैं ने दुनिया देखा धर्म पर से विश्वास उठ गया। ये सारे लोग झूठे हैं जो सुबह शाम राम अल्लाह का नाम लेते हैं और छुप कर गलत काम भी करते हैं लेकिन मैं राम अल्लाह का नाम नही लेता सिर्फ अपने दिल की सुनता हूं जो बुरा लगे वो बुरा और जो अच्छा लगे वो अच्छा।” अपने इस दोस्त के विचार जान कर मुझे बहुत खुशी हुई, पहली बार मुझे अपने विचारों जैसा अपने ही देश का ये मित्र मिला, मैं ने अपनी किस्मत का शुक्र अदा किया। आज अपने देश मे ऐसे बहुत सारे नौजवान हैं जो अपने धर्म मे पाबंदियों की वजह से तंग आचुके वो खुल कर जीना चाहते हैं लेकिन अपने माता-पिता की इज़्ज़त के लिए आवाज़ नही उठाते। ऐसे आज़ाद विचार वाले भी अपने मां बाप से डरते हैं और उनकी इज़्ज़त करते हैं, ऐसा प्यारा परिवार भारत के अलावा और कहां मिलेगा? ये कैसा अजीब देश है हमारा, जैसा भी हो वो हमें प्यारा।

इस लेख मे कुछ खास बात नही है, लेकिन ये लेख अपने इस मित्र के नाम लिख रहा हूं जो चार वर्ष साथ रहने के बाद उसके विचारों को पहली बार जान कर मुझे सच्ची खुशी मिली।

Entry Filed under: दुबई, ये ज़िनदगी. .

21 Comments Add your own

  • 1. pankaj bengani  |  October 27, 2006 at 10:02 am

    मेरी सोच भी आपके जैसी ही है। :-)

    यह जानकर दुःख हुआ कि आपको आपके हिन्दु भाईयों ने मारा…..

  • 2. संजय बेंग&hellip  |  October 27, 2006 at 10:14 am

    भई आपके तथा आपके दोस्त जैसे नौजवानो की भारत को ही नहीं पूरी दूनियाँ को जरूरत हैं.
    “अपने हिन्दू भाईयों से मार भी खा चुका हूं।”
    यह दुखद हैं पर पढ़ते हुए मुस्कुराया था क्योंकि यही अपना भारत हैं.

  • 3. राजेश  |  October 27, 2006 at 10:57 am

    शुएब भाई, एक संवेदनशील विषय पर अपने मन की बात सहजता से कह जाना आसान नहीं है। मुझे दुख हुआ की दंगे के समय आपको किसी ने हानि पहँचाने की कोशिश की, आपको लंबी आयु मिले। भारत एक अनोखा देश है जहाँ की खुशबू वही जान सकता है जिसने इसमें अपने आप को रमा दिया। और हाँ, त्योहार तो यहाँ का जीवन है।

  • 4. अली  |  October 27, 2006 at 11:04 am

    मेरा भारत महान – अली

  • 5. गिरिराज ज&hellip  |  October 27, 2006 at 11:33 am

    शुएब भाई, ज़ानदार आलेख है। विचारों का आदान-प्रदान ही चिट्ठों का प्राथमिक उद्देश्य है, आपके विचार सभी जनों तक पहूँचे यही कामना करते हूए आपके आलेख को काव्यमय करनें का छोटा सा प्रयास करता हूँ (पसंद आए तो पीठ ठोक दीजियेगा) -

    देश ऐसा त्योहारों से भरा कहो है कहीं पे दूजा
    कभी दीपावली, कभी रमज़ान तो कभी दुर्ग पूजा

    रात के बारह बजते ही जहां दुनिया पूरी पसर जाती है
    वक्त रमज़ान, दिपावली पे रौनक बाज़ारों मे लग जाती है
    रोशनी आलोकिक छा जाती, पूरे भारत मे सवेरा हो जाता
    कौन हिन्दू, कौन मुसलमान पहचानना मुश्किल हो जाता

    कहने को है दोस्त बहूत पर जो सच्चा वो एक हिन्दू है
    दोस्ती अपनी निभाता पर मुझे मुसलमान ही समझता है

    मैं नहीं पढ़ता नमाज़ और वो पाठ करना छोड़ गया
    जब से हमने देखी दुनिया धर्म से विश्वास खो गया
    राम-अल्लाह नाम नही लेते बस दिल की सुनते हैं
    दिल अब हमारा धर्म बना यहीं पर प्रभू बसते है

    ये कैसा अजीब देश है हमारा
    जैसा भी हो वो हमको प्यारा

    (और भी बहूत कुछ था आपके लेख में (जैसे नेताजी, दंगे) जिन्हें काव्य में ढ़ाला जा सकता था मगर कहीं आपकी पोस्ट से ज्यादा लम्बी हमारी टिप्पणी ना हो जाये, यही सोचकर “नैगेटीव” पर कैंची चला दी)

    :)

  • 6. Pratik Pandey  |  October 27, 2006 at 12:28 pm

    आपने ही सच्चे धर्म को पहचाना है। तत्वमसि श्वेतकेतु…

  • 7. अनुराग मि&hellip  |  October 27, 2006 at 1:24 pm

    सहजता से लिखा हुआ, सटीक लेख। दुख है कि आपको किसी दंगे में हानि हुई। आप और आपके मित्र के विचारों से सहमत हूँ।

  • 8. Raman Kaul  |  October 27, 2006 at 2:02 pm

    बहुत बढ़िया सोच है आप की। आप का पढ़ता हूँ तो लगता है, अपना ही पढ़ रहा हूँ — अब तो अपने चिट्ठों का रंग भी एक ही है। :-)
    धर्म के ढ़ोंग से दुनिया का कोई कोना नहीं बचा, अच्छा तब हो जब यह ढ़ोंग व्यक्तिगत क्रिया कलापों तक ही सीमित रहे और दूसरों को बदलने या मारने पीटने तक न पहुँचे। त्यौहारों का दौर अमरीका और अन्य पश्चिमी देशों में भी शुरू हो चुका है। यहाँ अभी हालोवीन है, फिर थैंक्सगिविंग, फिर क्रिस्मस, हानक्का… नव-वर्ष तक यही दौर चलता रहेगा।
    इस बार दीवाली और ईद के साथ मेरी पिछले साल की कुछ ग़मग़ीन यादें जुड़ी हुई हैं।

  • 9. जगदीश भाट&hellip  |  October 27, 2006 at 2:51 pm

    पढ़ते पढ़ते जी भर आया ! ! !

    यह भारत ऎसा इसलिये ही है क्योंकि आप और आपके दोस्त जैसे लोग इस तरह के हैं।
    सलाम ऎसे दोस्तों को और उनकी दोस्ती को।

  • 10. उन्मुक्त  |  October 27, 2006 at 3:44 pm

    त्योहारो में बड़ दिन भी महत्वपूर्ण है।

  • 11. समीर लाल  |  October 27, 2006 at 4:45 pm

    बहुत सुंदर प्रस्तुति है शुऎब भाई. बहुत सहजता के साथ आपने बहुत बडी बात, जिसे सबको समझना चाहिये, रखी है. इन नेताओं का क्या है, इनका धर्म, इमान सब कुछ वोट और नोट तक सिमित है, इन्हीं विचारों पर अभी इसी हफ्ते मैने चिट्ठा चर्चा पर एक कुंड्लीनुमा रचना भी पेश की थी, आप भी पढ़ें:

    मौका ये त्योहार का, मची हर तरफ है धूम
    क्या हिन्दु क्या मुसलमां, सभी रहे हैं झूम.
    सभी रहे हैं झूम कि नेता सब खुशी से आते
    मिठाई दिवाली की और ईद की दावत खाते
    कहे समीर कि इनको देख है हर कोई चौंका
    गले मिल ये ढ़ूंढ़ते, कल लड़वाने का मौका.


    -समीर लाल ‘समीर’

  • 12. ratna  |  October 28, 2006 at 6:11 am

    कौए बोलें या गौरया अच्छा लगता है
    अपने देश में सबकुछ भैया अच्छा लगता है।
    आप जैसी सोच वाले लोगों की संख्या बढ़ रही है,लकड़ी की हांडी में नेतायों की खिचड़ी ज्यादा दिन न पकेगी।

  • 13. SHUAIB  |  October 28, 2006 at 7:17 am

    टिप्पणीयों के लिए आप सभी का बहुत बहुत धन्यवाद। ईद की दो दिन छुट्टीयों मे शहर दर सहर घूमने के बाद आखिर मे सब दोस्तों को उनके घरों तक ड्रॉप किया फिर मैं और मेरा सच्चा मित्र थोडी देर आराम के लिए समुद्र किनारे बैठ गए और बातों ही बातों मे अपने विचारों का खुल कर इज़हार किया तो मुझे ये लेख लिखने का खयाल आया।

    1. pankaj bengani
    2. संजय बेंगाणी

    मानता हूं भाई और आप दोनों के विचारों से सहमित भी हूं। वो क्या है कि जब बेंगलौर के एक अखबार मे नौकरी करता था, मेरी नाइट शिफ्ट रहती थी – दंगों के मौके पर रात ढाई बजे घर वापसी के वक्त चंद लोगों ने मेरी गाडी रोकी और नाम पूछा फिर पकड कर मारा :(
    3. राजेश
    मेरी लम्बी लंबी आयु के लिए धन्यवाद, मगर भाई पैसा बहुत खर्च होता है इसमें ;) जब भारत से बाहर निकलो उस से मुहब्बत और बढ जाती है।
    4. अली
    टिप्पणी के लिए धन्यवाद, अगर आप अपना परिचय करवादेते तो अच्छा था।
    5. गिरिराज जोशी
    अरे भाई आप रुक क्यों गए? किसने रोका आपको? पीठ उनकी ठोंकी जाती है जो दूसरों को दिखाने के लिए कुछ तमाशा करते हैं लेकिन आप तो इतनी बढिया बातें लिख गए पास होते तो आपका माथा चूम लेता :) आपके शब्दों मे बहुत ताकत है जिसे पढ कर हर भारती के अंदर एक जोश उभरता है। आपकी शायरी बहुत पसंद आई अगर आप और भी लिखते तो और भी मज़ा आता।
    6. Pratik Pandey
    प्रातिक भाई, होसला अफज़ाई के लिए आपका शुक्रिया।
    7. अनुराग मिश्र
    अनुराग भाई, हम दोनों के विचारों से सहमित होने के लिए आपका धन्यवाद।
    8. Raman Kaul
    रमण जीः मुझे तो आपके लेखों का इनतेज़ार रहता है, अफसोस है कि अब आप बहुत कम लिखते हैं। हम दोनों के चिट्ठों का रंग भी एक है और मैं हिन्दी टैपिंग के लिए आप ही का “UniNagari” इसतेमाल करता हूं, ये मेरे लिए बहुत आसान है और हर बार दिल ही दिल मे आपका शुक्रिया अदा करता हूं :)
    आपके दिये हुए लिंक का लेख पढा, और पढते हुए वाकई बहुत दुःख हुआ।
    9. जगदीश भाटिया
    भाटिया जीः आपकी टिप्पणी और शुभकामनाओं के लिए बहुत बहुत धन्यवाद।
    10. उन्मुक्त
    जी सही फरमाया, टिप्पणी के लिए धन्यवाद।
    11. समीर लाल
    समीर जी, आपने तो चिट्ठों का भविषय बता चंद चिट्ठाकारों को खुश किया तो चंद को निराश करदिया जैसा के मैं :( मेरे चिट्ठे का भविषय पढ कर लगा की अब मुझे अपने चिट्ठे का नाम बदली करके U से रखना पडेगा ;)
    अपकी ये पंकियां बहुत पसंद आईः

    आपका धन्यवाद :)
    12. ratna
    रत्ना जी, बिलकुल सही फर्माया आपने और टिप्पणी के लिए धन्यवाद :)

  • 14. Debashish  |  October 28, 2006 at 12:58 pm

    Dil ko chhu gaya ye lekh Shuaib :)

    Hind ki ganga jamuni tehzeeb ko highlight karti ek kahani Saidab Bi maine likhi thia kabhi jo Nirantar per chahpi thi (filhaal link uplabh nahi).

  • 15. सागर चन्द&hellip  |  October 28, 2006 at 2:17 pm

    काम में फ़ँस जाने की वजह से बहुत देर बाद पढ़ पाया यह सुन्दर लेख, आपके विचार और आदर्श बहुत ऊँचे है।

  • 16. bhuvnesh  |  October 28, 2006 at 7:08 pm

    वाकई आपके विचार जानकर गर्व हुआ कि एक इंसान भारत से इतना दूर रहकर भी उसके कितने पास है। लोग जिंदगी में एक अदद सच्चे दोस्त की चाहत में भटकते है पर आपकी चाहत खुदा ने पूरी कर दी शुभकामनायें।

  • 17. kali  |  October 29, 2006 at 11:01 am

    shoaib tumhari tarah sochne waalon main ek entry apni bhi

  • 18. PRABHAT TANDON  |  October 29, 2006 at 11:26 pm

    शुएब भाई ,
    क्या आपको लगता है कि मजहब के नाम पर दगे करने वाले वाकई मे हिन्दू, मुसलिम या कोई और धर्म के कहलाने योग्य होते है। वह सिर्फ़ फ़सादी हो सकते हैं और कोई नही।
    दूसरा ‘ मजहब नही सिखाता आपस मे बैर रखना” यह डायलाग एक निहायत घिसा-पिटा और बकवास है। सच तो यह है कि जिस दिन हम एक धर्म पर अपनी आस्था रखना शुरु करते है उसी दिन से हमारी सोच एक जगह पर जा केन्द्रित हो जाती है। अपने धर्म के आगे दूसरो के धर्म बौने और तुच्छ नजर आते हैं। भले ही कोई धर्म सीधे रुप से बैर रखना नही सिखाता हो लेकिन indirect way मे वही करता है। सच तो यही है कि सारे के सारे धर्म फ़साद की जड हैं।
    बहुत सालों से हम so called मजहबी समाज मे जी लिये, कुछ दिन के लिये ऐसे समाज मे जी कर देखें जहाँ कोई हिन्दू, मुस्लिम या कोई और धर्मावलम्बी न हो।

  • 19. प्रत्यक्&hellip  |  October 30, 2006 at 6:01 am

    दिल से कही बात सरल सीधे सच्चे शब्दों और भाव में । आप जैसे लोग हैं इसलिये मेरा भारत महान है ।

  • 20. SHUAIB  |  October 30, 2006 at 7:40 am

    14. Debashish
    टिप्पणी के लिए आपका धन्यवाद और लिंक मिलने पर ज़रूर दीजिएगा।
    15. सागर चन्द नाहर
    आपके आने और टिप्पणी के लिए शुक्रिया नाहर भाई।
    16. bhuvnesh
    आपकी शुभकानाऊँ का बेहद शुक्रिया भाई, भारत से दूर आने पर उस से मुहब्बत और बढ जाती है।
    17. kali
    ये टीम तो नहीं मगर नए भारत को बनाने के लिए नई सोच की ज़रूरत होती और धर्म से हट कर विचार रखने वाले ही भारत को आगे लेजा सकते हैं। आपका स्वागत है भाई
    18. PRABHAT TANDON
    शुक्रिया प्रभात भाई आपने तो मेरी दिल की बात कह डाली ये मुहाविरा “मजहब नही सिखाता आपस मे बैर रखना” बिलकुल गलत है, ये धर्म ही तो है जिसने हम इनसानों के तुकडे तुकडे करडाले, हमें आपस मे लडवाता भी है, ये सारे दंगे फसाद धर्म की ही वजह से होते हैं। अगर ये धर्म ना होते तो आज जो दुनिया भर मे खून खराबे हो रहे हैं, वो नहीं होते। हमारे भारत मे लोग अपने धर्म से हट कर आगे की सोचते ही नहीं क्योंकि धर्म से हट कर सोचने को गुनाह समझते हैं। और आपकी ये बात भी सही है कि दंगे फसाद मचाने वाले धार्मिक नही होते मगर इसी की वजह से हिन्दू मिस्लमानों मे और ज़्यादा नफरत फैलती है (फसाद मचाए कोई और मरे कोई) हमारे देश की खुशहाली इसी मे है कि सभी भारतीयों को अपने धर्म के लिए नही बल्कि अपने देश के लिए जीना होगा मगर क्या ये मुमकिन है…… हां ये मुमकिन है क्योंकि हमारी आने वाली नसलें साबित करेंगी।
    19. प्रत्यक्षा
    टिप्पणी के लिए शुक्रिया प्रत्यक्षा जी – मेरे दिल मे और भी कई बातें हैं जो मैं लिखना चाहता हूं और यही बातें जब मैं अपने उर्दू ब्लॉग पर लिखता रहा तो लोग उसे पढ कर भडक उठते थे और मेरी सोच को शैतानी सोच कहते थे। मैं तो किसी को बुरा भला नही कहा सिर्फ अपने दिल की बातें लिखता हूं। भारत मे ऐसी सोच रखने वाले लाखों हैं मगर वो अपनी दिल की बात खुल कर नही कह सकते।

  • 21. इदन्नम्म  |  October 31, 2006 at 11:45 am

    शुएब भाई
    सचमुच आपने दिल को छू लेने वाला आलेख लिखा है। आपके साथी ने ठीक ही कहा है सच को सच, तथा झूठ को झूठ मानना भी धर्म की ही एक परिभाषा है। स्वामी दयानंद ने इसी को आधार बना कर ‘आर्य समाज’ की स्थापना की थी। इसके अतिरिक्त मेरा मानना है कि आदमी के विचारों में सकिंर्णता भी तभी आती है जब उसे धर्म का अल्प या अति ज्ञान होता है। मधय्म मार्गी आदमी कभी दुसरे धर्म के मानने वाले को हानि नही पहुचाँ सकता।

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