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	<title>Comments on: ये भारत है जनाब !!!</title>
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	<description>MY HINDI BLOG</description>
	<pubDate>Fri, 09 May 2008 17:44:01 +0000</pubDate>
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		<title>By: इदन्नम्म</title>
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		<dc:creator>इदन्नम्म</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 31 Oct 2006 11:45:23 +0000</pubDate>
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		<description>शुएब भाई
सचमुच आपने दिल को छू लेने वाला आलेख लिखा है। आपके साथी ने ठीक ही कहा है सच को सच, तथा झूठ को झूठ मानना भी धर्म की ही एक परिभाषा है। स्वामी दयानंद ने इसी को आधार बना कर 'आर्य समाज' की स्थापना की थी। इसके अतिरिक्त मेरा मानना है कि आदमी के विचारों में सकिंर्णता भी तभी आती है जब उसे धर्म का अल्प या अति ज्ञान होता है। मधय्म मार्गी आदमी कभी दुसरे धर्म के मानने वाले को हानि नही पहुचाँ सकता।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>शुएब भाई<br />
सचमुच आपने दिल को छू लेने वाला आलेख लिखा है। आपके साथी ने ठीक ही कहा है सच को सच, तथा झूठ को झूठ मानना भी धर्म की ही एक परिभाषा है। स्वामी दयानंद ने इसी को आधार बना कर &#8216;आर्य समाज&#8217; की स्थापना की थी। इसके अतिरिक्त मेरा मानना है कि आदमी के विचारों में सकिंर्णता भी तभी आती है जब उसे धर्म का अल्प या अति ज्ञान होता है। मधय्म मार्गी आदमी कभी दुसरे धर्म के मानने वाले को हानि नही पहुचाँ सकता।</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: SHUAIB</title>
		<link>http://shuaibi.wordpress.com/2006/10/27/%e0%a4%af%e0%a5%87-%e0%a4%ad%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%a4-%e0%a4%b9%e0%a5%88-%e0%a4%9c%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%ac/#comment-434</link>
		<dc:creator>SHUAIB</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 30 Oct 2006 07:40:54 +0000</pubDate>
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		<description>&lt;b&gt;14. Debashish&lt;/b&gt;
टिप्पणी के लिए आपका धन्यवाद और लिंक मिलने पर ज़रूर दीजिएगा।
&lt;b&gt;15. सागर चन्द नाहर&lt;/b&gt;
आपके आने और टिप्पणी के लिए शुक्रिया नाहर भाई।
&lt;b&gt;16. bhuvnesh&lt;/b&gt;
आपकी शुभकानाऊँ का बेहद शुक्रिया भाई, भारत से दूर आने पर उस से मुहब्बत और बढ जाती है।
&lt;b&gt;17. kali&lt;/b&gt;
ये टीम तो नहीं मगर नए भारत को बनाने के लिए नई सोच की ज़रूरत होती और धर्म से हट कर विचार रखने वाले ही भारत को आगे लेजा सकते हैं। आपका स्वागत है भाई
&lt;b&gt;18.  PRABHAT TANDON &lt;/b&gt;
शुक्रिया प्रभात भाई आपने तो मेरी दिल की बात कह डाली ये मुहाविरा &lt;b&gt;"मजहब नही सिखाता आपस मे बैर रखना"&lt;/b&gt; बिलकुल गलत है, ये धर्म ही तो है जिसने हम इनसानों के तुकडे तुकडे करडाले, हमें आपस मे लडवाता भी है, ये सारे दंगे फसाद धर्म की ही वजह से होते हैं। अगर ये धर्म ना होते तो आज जो दुनिया भर मे खून खराबे हो रहे हैं, वो नहीं होते। हमारे भारत मे लोग अपने धर्म से हट कर आगे की सोचते ही नहीं क्योंकि धर्म से हट कर सोचने को गुनाह समझते हैं। और आपकी ये बात भी सही है कि दंगे फसाद मचाने वाले धार्मिक नही होते मगर इसी की वजह से हिन्दू मिस्लमानों मे और ज़्यादा नफरत फैलती है (फसाद मचाए कोई और मरे कोई) हमारे देश की खुशहाली इसी मे है कि सभी भारतीयों को अपने धर्म के लिए नही बल्कि अपने देश के लिए जीना होगा मगर क्या ये मुमकिन है...... हां ये मुमकिन है क्योंकि हमारी आने वाली नसलें साबित करेंगी।
&lt;b&gt;19. प्रत्यक्षा&lt;/b&gt;
टिप्पणी के लिए शुक्रिया प्रत्यक्षा जी - मेरे दिल मे और भी कई बातें हैं जो मैं लिखना चाहता हूं और यही बातें जब मैं अपने उर्दू ब्लॉग पर लिखता रहा तो लोग उसे पढ कर भडक उठते थे और मेरी सोच को शैतानी सोच कहते थे। मैं तो किसी को बुरा भला नही कहा सिर्फ अपने दिल की बातें लिखता हूं। भारत मे ऐसी सोच रखने वाले लाखों हैं मगर वो अपनी दिल की बात खुल कर नही कह सकते।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p><b>14. Debashish</b><br />
टिप्पणी के लिए आपका धन्यवाद और लिंक मिलने पर ज़रूर दीजिएगा।<br />
<b>15. सागर चन्द नाहर</b><br />
आपके आने और टिप्पणी के लिए शुक्रिया नाहर भाई।<br />
<b>16. bhuvnesh</b><br />
आपकी शुभकानाऊँ का बेहद शुक्रिया भाई, भारत से दूर आने पर उस से मुहब्बत और बढ जाती है।<br />
<b>17. kali</b><br />
ये टीम तो नहीं मगर नए भारत को बनाने के लिए नई सोच की ज़रूरत होती और धर्म से हट कर विचार रखने वाले ही भारत को आगे लेजा सकते हैं। आपका स्वागत है भाई<br />
<b>18.  PRABHAT TANDON </b><br />
शुक्रिया प्रभात भाई आपने तो मेरी दिल की बात कह डाली ये मुहाविरा <b>&#8220;मजहब नही सिखाता आपस मे बैर रखना&#8221;</b> बिलकुल गलत है, ये धर्म ही तो है जिसने हम इनसानों के तुकडे तुकडे करडाले, हमें आपस मे लडवाता भी है, ये सारे दंगे फसाद धर्म की ही वजह से होते हैं। अगर ये धर्म ना होते तो आज जो दुनिया भर मे खून खराबे हो रहे हैं, वो नहीं होते। हमारे भारत मे लोग अपने धर्म से हट कर आगे की सोचते ही नहीं क्योंकि धर्म से हट कर सोचने को गुनाह समझते हैं। और आपकी ये बात भी सही है कि दंगे फसाद मचाने वाले धार्मिक नही होते मगर इसी की वजह से हिन्दू मिस्लमानों मे और ज़्यादा नफरत फैलती है (फसाद मचाए कोई और मरे कोई) हमारे देश की खुशहाली इसी मे है कि सभी भारतीयों को अपने धर्म के लिए नही बल्कि अपने देश के लिए जीना होगा मगर क्या ये मुमकिन है&#8230;&#8230; हां ये मुमकिन है क्योंकि हमारी आने वाली नसलें साबित करेंगी।<br />
<b>19. प्रत्यक्षा</b><br />
टिप्पणी के लिए शुक्रिया प्रत्यक्षा जी - मेरे दिल मे और भी कई बातें हैं जो मैं लिखना चाहता हूं और यही बातें जब मैं अपने उर्दू ब्लॉग पर लिखता रहा तो लोग उसे पढ कर भडक उठते थे और मेरी सोच को शैतानी सोच कहते थे। मैं तो किसी को बुरा भला नही कहा सिर्फ अपने दिल की बातें लिखता हूं। भारत मे ऐसी सोच रखने वाले लाखों हैं मगर वो अपनी दिल की बात खुल कर नही कह सकते।</p>
]]></content:encoded>
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	<item>
		<title>By: प्रत्यक्षा</title>
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		<dc:creator>प्रत्यक्षा</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 30 Oct 2006 06:01:11 +0000</pubDate>
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		<description>दिल से कही बात सरल सीधे सच्चे शब्दों और भाव में । आप जैसे लोग हैं इसलिये मेरा भारत महान है ।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>दिल से कही बात सरल सीधे सच्चे शब्दों और भाव में । आप जैसे लोग हैं इसलिये मेरा भारत महान है ।</p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: PRABHAT TANDON</title>
		<link>http://shuaibi.wordpress.com/2006/10/27/%e0%a4%af%e0%a5%87-%e0%a4%ad%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%a4-%e0%a4%b9%e0%a5%88-%e0%a4%9c%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%ac/#comment-432</link>
		<dc:creator>PRABHAT TANDON</dc:creator>
		<pubDate>Sun, 29 Oct 2006 23:26:36 +0000</pubDate>
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		<description>शुएब भाई ,
   क्या आपको लगता है कि मजहब के नाम पर दगे करने वाले वाकई मे हिन्दू, मुसलिम या कोई और धर्म के कहलाने योग्य होते है। वह सिर्फ़ फ़सादी हो सकते हैं और कोई नही। 
  दूसरा ' मजहब नही सिखाता आपस मे बैर रखना" यह डायलाग एक निहायत घिसा-पिटा और बकवास है। सच तो यह है कि जिस दिन हम एक धर्म पर अपनी आस्था रखना शुरु करते है उसी दिन से हमारी सोच एक जगह पर जा केन्द्रित हो जाती है। अपने धर्म के आगे दूसरो के धर्म बौने और तुच्छ नजर आते हैं। भले ही कोई धर्म सीधे रुप से बैर रखना नही सिखाता हो लेकिन indirect way मे वही करता है। सच तो यही है कि सारे के सारे धर्म फ़साद की जड हैं।
  बहुत सालों से हम so called मजहबी समाज मे जी लिये, कुछ दिन के लिये ऐसे समाज मे जी कर देखें जहाँ कोई हिन्दू, मुस्लिम या कोई और धर्मावलम्बी न हो।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>शुएब भाई ,<br />
   क्या आपको लगता है कि मजहब के नाम पर दगे करने वाले वाकई मे हिन्दू, मुसलिम या कोई और धर्म के कहलाने योग्य होते है। वह सिर्फ़ फ़सादी हो सकते हैं और कोई नही।<br />
  दूसरा &#8216; मजहब नही सिखाता आपस मे बैर रखना&#8221; यह डायलाग एक निहायत घिसा-पिटा और बकवास है। सच तो यह है कि जिस दिन हम एक धर्म पर अपनी आस्था रखना शुरु करते है उसी दिन से हमारी सोच एक जगह पर जा केन्द्रित हो जाती है। अपने धर्म के आगे दूसरो के धर्म बौने और तुच्छ नजर आते हैं। भले ही कोई धर्म सीधे रुप से बैर रखना नही सिखाता हो लेकिन indirect way मे वही करता है। सच तो यही है कि सारे के सारे धर्म फ़साद की जड हैं।<br />
  बहुत सालों से हम so called मजहबी समाज मे जी लिये, कुछ दिन के लिये ऐसे समाज मे जी कर देखें जहाँ कोई हिन्दू, मुस्लिम या कोई और धर्मावलम्बी न हो।</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: kali</title>
		<link>http://shuaibi.wordpress.com/2006/10/27/%e0%a4%af%e0%a5%87-%e0%a4%ad%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%a4-%e0%a4%b9%e0%a5%88-%e0%a4%9c%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%ac/#comment-431</link>
		<dc:creator>kali</dc:creator>
		<pubDate>Sun, 29 Oct 2006 11:01:37 +0000</pubDate>
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		<description>shoaib tumhari tarah sochne waalon main ek entry apni bhi</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>shoaib tumhari tarah sochne waalon main ek entry apni bhi</p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: bhuvnesh</title>
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		<dc:creator>bhuvnesh</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 28 Oct 2006 19:08:34 +0000</pubDate>
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		<description>वाकई आपके विचार जानकर गर्व हुआ कि एक इंसान भारत से इतना दूर रहकर भी उसके कितने पास है। लोग जिंदगी में एक अदद सच्चे दोस्त की चाहत में भटकते है पर आपकी चाहत खुदा ने पूरी कर दी शुभकामनायें।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>वाकई आपके विचार जानकर गर्व हुआ कि एक इंसान भारत से इतना दूर रहकर भी उसके कितने पास है। लोग जिंदगी में एक अदद सच्चे दोस्त की चाहत में भटकते है पर आपकी चाहत खुदा ने पूरी कर दी शुभकामनायें।</p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: सागर चन्द नाहर</title>
		<link>http://shuaibi.wordpress.com/2006/10/27/%e0%a4%af%e0%a5%87-%e0%a4%ad%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%a4-%e0%a4%b9%e0%a5%88-%e0%a4%9c%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%ac/#comment-428</link>
		<dc:creator>सागर चन्द नाहर</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 28 Oct 2006 14:17:03 +0000</pubDate>
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		<description>काम में फ़ँस जाने की वजह से बहुत देर  बाद पढ़ पाया यह सुन्दर लेख, आपके विचार और आदर्श बहुत ऊँचे है।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>काम में फ़ँस जाने की वजह से बहुत देर  बाद पढ़ पाया यह सुन्दर लेख, आपके विचार और आदर्श बहुत ऊँचे है।</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: Debashish</title>
		<link>http://shuaibi.wordpress.com/2006/10/27/%e0%a4%af%e0%a5%87-%e0%a4%ad%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%a4-%e0%a4%b9%e0%a5%88-%e0%a4%9c%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%ac/#comment-427</link>
		<dc:creator>Debashish</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 28 Oct 2006 12:58:20 +0000</pubDate>
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		<description>Dil ko chhu gaya ye lekh Shuaib :)

Hind ki ganga jamuni tehzeeb ko highlight karti ek kahani Saidab Bi maine likhi thia kabhi jo Nirantar per chahpi thi (filhaal link uplabh nahi).</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>Dil ko chhu gaya ye lekh Shuaib <img src='http://s.wordpress.com/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' /> </p>
<p>Hind ki ganga jamuni tehzeeb ko highlight karti ek kahani Saidab Bi maine likhi thia kabhi jo Nirantar per chahpi thi (filhaal link uplabh nahi).</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: SHUAIB</title>
		<link>http://shuaibi.wordpress.com/2006/10/27/%e0%a4%af%e0%a5%87-%e0%a4%ad%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%a4-%e0%a4%b9%e0%a5%88-%e0%a4%9c%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%ac/#comment-426</link>
		<dc:creator>SHUAIB</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 28 Oct 2006 07:17:46 +0000</pubDate>
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		<description>टिप्पणीयों के लिए आप सभी का बहुत बहुत धन्यवाद। ईद की दो दिन छुट्टीयों मे शहर दर सहर घूमने के बाद आखिर मे सब दोस्तों को उनके घरों तक ड्रॉप किया फिर मैं और मेरा सच्चा मित्र थोडी देर आराम के लिए समुद्र किनारे बैठ गए और बातों ही बातों मे अपने विचारों का खुल कर इज़हार किया तो मुझे ये लेख लिखने का खयाल आया।

&lt;b&gt;1. pankaj bengani
2. संजय बेंगाणी&lt;/b&gt;
मानता हूं भाई और आप दोनों के विचारों से सहमित भी हूं। वो क्या है कि जब बेंगलौर के एक अखबार मे नौकरी करता था, मेरी नाइट शिफ्ट रहती थी - दंगों के मौके पर रात ढाई बजे घर वापसी के वक्त चंद लोगों ने मेरी गाडी रोकी और नाम पूछा फिर पकड कर मारा :(
&lt;b&gt;3. राजेश&lt;/b&gt;
मेरी लम्बी लंबी आयु के लिए धन्यवाद, मगर भाई पैसा बहुत खर्च होता है इसमें ;) जब भारत से बाहर निकलो उस से मुहब्बत और बढ जाती है।
&lt;b&gt;4. अली&lt;/b&gt;
टिप्पणी के लिए धन्यवाद, अगर आप अपना परिचय करवादेते तो अच्छा था।
&lt;b&gt;5. गिरिराज जोशी&lt;/b&gt;
अरे भाई आप रुक क्यों गए? किसने रोका आपको? पीठ उनकी ठोंकी जाती है जो दूसरों को दिखाने के लिए कुछ तमाशा करते हैं लेकिन आप तो इतनी बढिया बातें लिख गए पास होते तो आपका माथा चूम लेता :) आपके शब्दों मे बहुत ताकत है जिसे पढ कर हर भारती के अंदर एक जोश उभरता है। आपकी शायरी बहुत पसंद आई अगर आप और भी लिखते तो और भी मज़ा आता।
&lt;b&gt;6. Pratik Pandey&lt;/b&gt;
प्रातिक भाई, होसला अफज़ाई के लिए आपका शुक्रिया।
&lt;b&gt;7. अनुराग मिश्र&lt;/b&gt;
अनुराग भाई, हम दोनों के विचारों से सहमित होने के लिए आपका धन्यवाद।
&lt;b&gt;8. Raman Kaul&lt;/b&gt;
रमण जीः मुझे तो आपके लेखों का इनतेज़ार रहता है, अफसोस है कि अब आप बहुत कम लिखते हैं। हम दोनों के चिट्ठों का रंग भी एक है और मैं हिन्दी टैपिंग के लिए आप ही का "UniNagari" इसतेमाल करता हूं, ये मेरे लिए बहुत आसान है और हर बार दिल ही दिल मे आपका शुक्रिया अदा करता हूं :)
आपके दिये हुए लिंक का लेख पढा, और पढते हुए वाकई बहुत दुःख हुआ।
&lt;b&gt;9.  जगदीश भाटिया&lt;/b&gt;
भाटिया जीः आपकी टिप्पणी और शुभकामनाओं के लिए बहुत बहुत धन्यवाद।
&lt;b&gt;10. उन्मुक्त&lt;/b&gt;
जी सही फरमाया, टिप्पणी के लिए धन्यवाद।
&lt;b&gt;11. समीर लाल&lt;/b&gt;
समीर जी, आपने तो चिट्ठों का भविषय बता चंद चिट्ठाकारों को खुश किया तो चंद को निराश करदिया जैसा के मैं :(  मेरे चिट्ठे का भविषय पढ कर लगा की अब मुझे अपने चिट्ठे का नाम बदली करके U से रखना पडेगा ;)
अपकी ये पंकियां बहुत पसंद आईः
&lt;blockquote cite="मौका ये त्योहार का, मची हर तरफ है धूम
क्या हिन्दु क्या मुसलमां, सी रहे हैं झूम.
सी रहे हैं झूम कि नेता सब खुशी से आते
मिठाई दिवाली की और ईद की दावत खाते
कहे समीर कि इनको देख है हर कोई चौंका
गले मिल ये ढ़ूंढ़ते, कल लड़वाने का मौका."&gt; 
आपका धन्यवाद :)
&lt;b&gt;12. ratna&lt;/b&gt;
रत्ना जी, बिलकुल सही फर्माया आपने और टिप्पणी के लिए धन्यवाद :)&lt;/blockquote&gt;</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>टिप्पणीयों के लिए आप सभी का बहुत बहुत धन्यवाद। ईद की दो दिन छुट्टीयों मे शहर दर सहर घूमने के बाद आखिर मे सब दोस्तों को उनके घरों तक ड्रॉप किया फिर मैं और मेरा सच्चा मित्र थोडी देर आराम के लिए समुद्र किनारे बैठ गए और बातों ही बातों मे अपने विचारों का खुल कर इज़हार किया तो मुझे ये लेख लिखने का खयाल आया।</p>
<p><b>1. pankaj bengani<br />
2. संजय बेंगाणी</b><br />
मानता हूं भाई और आप दोनों के विचारों से सहमित भी हूं। वो क्या है कि जब बेंगलौर के एक अखबार मे नौकरी करता था, मेरी नाइट शिफ्ट रहती थी - दंगों के मौके पर रात ढाई बजे घर वापसी के वक्त चंद लोगों ने मेरी गाडी रोकी और नाम पूछा फिर पकड कर मारा <img src='http://s.wordpress.com/wp-includes/images/smilies/icon_sad.gif' alt=':(' class='wp-smiley' /><br />
<b>3. राजेश</b><br />
मेरी लम्बी लंबी आयु के लिए धन्यवाद, मगर भाई पैसा बहुत खर्च होता है इसमें <img src='http://s.wordpress.com/wp-includes/images/smilies/icon_wink.gif' alt=';)' class='wp-smiley' /> जब भारत से बाहर निकलो उस से मुहब्बत और बढ जाती है।<br />
<b>4. अली</b><br />
टिप्पणी के लिए धन्यवाद, अगर आप अपना परिचय करवादेते तो अच्छा था।<br />
<b>5. गिरिराज जोशी</b><br />
अरे भाई आप रुक क्यों गए? किसने रोका आपको? पीठ उनकी ठोंकी जाती है जो दूसरों को दिखाने के लिए कुछ तमाशा करते हैं लेकिन आप तो इतनी बढिया बातें लिख गए पास होते तो आपका माथा चूम लेता <img src='http://s.wordpress.com/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' /> आपके शब्दों मे बहुत ताकत है जिसे पढ कर हर भारती के अंदर एक जोश उभरता है। आपकी शायरी बहुत पसंद आई अगर आप और भी लिखते तो और भी मज़ा आता।<br />
<b>6. Pratik Pandey</b><br />
प्रातिक भाई, होसला अफज़ाई के लिए आपका शुक्रिया।<br />
<b>7. अनुराग मिश्र</b><br />
अनुराग भाई, हम दोनों के विचारों से सहमित होने के लिए आपका धन्यवाद।<br />
<b>8. Raman Kaul</b><br />
रमण जीः मुझे तो आपके लेखों का इनतेज़ार रहता है, अफसोस है कि अब आप बहुत कम लिखते हैं। हम दोनों के चिट्ठों का रंग भी एक है और मैं हिन्दी टैपिंग के लिए आप ही का &#8220;UniNagari&#8221; इसतेमाल करता हूं, ये मेरे लिए बहुत आसान है और हर बार दिल ही दिल मे आपका शुक्रिया अदा करता हूं <img src='http://s.wordpress.com/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' /><br />
आपके दिये हुए लिंक का लेख पढा, और पढते हुए वाकई बहुत दुःख हुआ।<br />
<b>9.  जगदीश भाटिया</b><br />
भाटिया जीः आपकी टिप्पणी और शुभकामनाओं के लिए बहुत बहुत धन्यवाद।<br />
<b>10. उन्मुक्त</b><br />
जी सही फरमाया, टिप्पणी के लिए धन्यवाद।<br />
<b>11. समीर लाल</b><br />
समीर जी, आपने तो चिट्ठों का भविषय बता चंद चिट्ठाकारों को खुश किया तो चंद को निराश करदिया जैसा के मैं <img src='http://s.wordpress.com/wp-includes/images/smilies/icon_sad.gif' alt=':(' class='wp-smiley' />  मेरे चिट्ठे का भविषय पढ कर लगा की अब मुझे अपने चिट्ठे का नाम बदली करके U से रखना पडेगा <img src='http://s.wordpress.com/wp-includes/images/smilies/icon_wink.gif' alt=';)' class='wp-smiley' /><br />
अपकी ये पंकियां बहुत पसंद आईः</p>
<blockquote cite="मौका ये त्योहार का, मची हर तरफ है धूम<br />
क्या हिन्दु क्या मुसलमां, सी रहे हैं झूम.<br />
सी रहे हैं झूम कि नेता सब खुशी से आते<br />
मिठाई दिवाली की और ईद की दावत खाते<br />
कहे समीर कि इनको देख है हर कोई चौंका<br />
गले मिल ये ढ़ूंढ़ते, कल लड़वाने का मौका."><p>
आपका धन्यवाद <img src='http://s.wordpress.com/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' /><br />
<b>12. ratna</b><br />
रत्ना जी, बिलकुल सही फर्माया आपने और टिप्पणी के लिए धन्यवाद <img src='http://s.wordpress.com/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' /> </p></blockquote>
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		<title>By: ratna</title>
		<link>http://shuaibi.wordpress.com/2006/10/27/%e0%a4%af%e0%a5%87-%e0%a4%ad%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%a4-%e0%a4%b9%e0%a5%88-%e0%a4%9c%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%ac/#comment-425</link>
		<dc:creator>ratna</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 28 Oct 2006 06:11:57 +0000</pubDate>
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		<description>कौए बोलें या गौरया अच्छा लगता है 
अपने देश में सबकुछ भैया अच्छा लगता है।
आप जैसी सोच वाले लोगों की संख्या बढ़ रही है,लकड़ी की हांडी में नेतायों की खिचड़ी ज्यादा दिन न पकेगी।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>कौए बोलें या गौरया अच्छा लगता है<br />
अपने देश में सबकुछ भैया अच्छा लगता है।<br />
आप जैसी सोच वाले लोगों की संख्या बढ़ रही है,लकड़ी की हांडी में नेतायों की खिचड़ी ज्यादा दिन न पकेगी।</p>
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