Posts filed under 'खबर पर नज़र'

एक नई खबर चाहिए

कोकाकोला और पेप्सी ये दोनों कम्यनियाँ पूरी दुनिया को पिला रही हैं मगर मजाल है जो किसी ने उन्हें कुछ पिलाया हो? यहां तक कि देसी थंब्सअप भी उन्ही के हाथों की पी जारही है। चंद साल पहले कुछ मुसलिम देशों मे “मक्का कोला” बनाया गया और खूब चर्चा भी हुई कि उन अमेरिकन ड्रिंक्स की कमर तोडें। आज मक्का कोला कम्पनी खतम होते नज़र आती है, उसके ब्रांच्स सऔदी आरबिया, कुवैत, इमारात तक फैले हुए थे मगर अफसोस पेप्सी और कोकाकोला कम्पनियों ने मक्का कोला को कही भी टिकने नही दिया। “मक्का” मुसलमानों के लिए पवित्र शहर है, और सॉफ्ट ड्रिंक का नाम भी मक्का इस लिए रखा गया कि मुसलमान ये ड्रिंक पीकर उन अमेरिकन सॉफ्ट ड्रिंक्स का बैन करे। आज मक्का कोला कम्पनी वाले बैठ कर खुद कोकाकोला और पेप्सी पी रहे हैं।

हमारे भारत मे अजीबवगरीब तमाशे होते रहते हैं, और जनता ऐसी कि हर नई खबर का चर्चा खुद करते नही थकती, न्यूज़ चैनल के रिपोर्टर भी आम जनता से पूछ कर खबरें बताते हैं और आखिर मे कहते हैं जैसे ये खुद खबर दे रहे हों –> केमरा मेन शुऐब के साथ दिल्ली से जितेन्द्र चौधरी कल तक चैनल के लिए। ये महान देश की महान जनता है जो सबकी खबर रखती है, अभी देखना चंद दिनों बाद शायद दोनों कम्पनियां अपने सॉफ्ट ड्रिंक्स की कीमतें कम करेंगी और हर कोई प्पसी और कोका पीते नज़र आऐंगे तब कोई और नई खबर की चर्चा चलेगी।

हम पे एक लतीफा याद आयाः
जब भारत यात्रा पर गए थे, घर के करीब दुकान से 12 रूपये देकर एक कोकाकोला का बोतल खरीदा और निकल पडे।
दुकानदार की आवाज़ आईः औईईई — कहां चले? बोतल - बोतल।
हमने जवाब दियाः हां - वोह तो है और पैसे भी अदा किए और अब किया?
दुकानदार और वहां खडे लोग हम पर हैरान कि 12 रूपये मे कोकाकोला के साथ बोतल भी ले जारहा है - कहां से आया ये?
अचानक हमे शर्मिंदगी का अहसास हुवा - अरररे ये दुबई नही हमारा भारत है। वहां दुबई मे तो एक दिरहम (12 रूपये) मे कोकाकोला के साथ कांच का बोतल भी फ्री है। और हमारे देश मे कोका पीने के बाद बोतल लिए बगैर दुकानदार जाने नही देता :D


6 comments August 12, 2006

आज की ताज़ा खबर

अखबार का नाम “रोज़नामा इनकिलाब मुंबई”

भाषाः उर्दू

बडी हेडलाईनः “इज़राईल पर हिज़बुल्लाह का कामयाबतरीन हमला”

छोटी हेडलाईनः “हिज़बुल्लाह के कामयाब हमले से तलअबिब झल्ला उठा”

हमारी टिप्पणीः

शायद मुसलमानों को खुश करने के लिए ऐसी सुरखी लिखी है - और क्यों ना लिखे अखबार मुसलमानों का और पढने वाले मुसलमान - ज़ाहिर सी बात है हिज़बुल्लाह दूसरों के लिए आतंकवादी और मुसलमानों के लिए मुजाहिद का मुकाम रखते हैं। मगर एक अखबार किया किसी की तरफदारी कर सकता है अखबार का काम होता है कि बगैर किसी की तरफदारी किए सिर्फ खबरें छापे ना कि किसी को खुश करने के लिए। चूंके ये अखबार इन्टरनेट पर गिफ फॉरमेट मे खबरें छापता है जिसकी वजा से उसकी खबरों का यहां लिंक नही दिया जासकता - अभी थोडे दिन पहले भी इसी अखबार की एक खबर पर हम चोंक पडे सुरखी थी “इज़राईल के हमले मे पांच फिलिस्तीनी शहीद” किया ये अखबार बता सकता है कि “शहीद” किसको कहते हैं? फिलिस्तीनियों ने ऐसा कौनसा कारनामा कर दिखाया कि उन्हें शहीद के अलकाब से नवाज़ें। जबकि इस्लाम मे शहीद उसको कहते हैं जो इस्लाम के लिए लडते हुवे मरे। मगर फिलिस्तीन और इज़राईल दोनों आपस मे पुराने दुश्मन एक-दूसरे को मारते हैं - यही अगर फिलिस्तीनी इज़राईलियों को मारे तो वोह सिर्फ मरे और इज़राईल फिलिसतीनियों को मारे तो वोह शहीद। किया ये फिलिसतीनी इस्लाम के लिए लड रहे हैं जिन्हें इस्लाम किया चिज़ पता ही नही।

इसी अखबार मे ऐसी बहुत सारी खबरें गुज़र चुकी हैं जो शायद सिर्फ मुसलमानों को खुश करने के लिए लिखा जाता है। हम ने भी ज़मानों से अखबारों मे काम किया है - अखबार किसी की तरफदारी नही कर सकता उसे बगैर जानिबदारी के खबरें छापना है। मेरा पूछना ये था कि कुछ खास लोगों के लिए खबरें छापे तो किया वोह अखबार है?


6 comments August 8, 2006

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