Posts filed under 'टैम पास'

डिब्बों का मसला

भारत में सिर्फ दो बार नेट यूज़ किया जब पिछले महीने मैं छुटटी पर घर गया था। वहां आज भी अक्सर वेब सेन्टरों में क्म्प्यूटर पर Win98 इन्सटाल है और जब अपना ये ब्लॉग देखा तो मेरे सभी लेख डिब्बे बन गए, दूसरे हिन्दी ब्लॉग्स और नारद की साईट भी देखा वहां भी हिन्दी text डिब्बे बने हुवे थे। मुझे ये यूनीकोड के बारे में ज़्यादा जानकारी नहीं है। भारत में रहने तक मैं ने एक दो बार कोशिश की के साथी ब्लॉगर्स के लेख पढ लूँ पर शायद win98 कि वजा से और शायद मेरी कम स्मझी की वजा से सभी चिटठों में सिर्फ डिब्बे देखने को मिले।

वापस दुबई आया तो नारद जी के पन्ने इतने भरे हुवे हैं कि समझ में नहीं आ रहा कहां से शुरू करूं? और रमण कौल जी का ब्लॉग तो कई दिनों से खुलता ही नहीं पता नहीं क्यों? भारत जाने से दो महीना पहले ये हिन्दी ब्लॉग शुरू किया और तभी हिन्दी में टेपिंग सीखा था शुक्र है वापस आने के बाद किबोर्ड पर उँगलियॉ सही जगा चल रही हैं।

अभी तक मेरी समझ में ये नहीं आया कि ब्लॉग्स पर text की जगा डिब्बे क्यों नज़र आते हैं और हिन्दी का फाँट डाउनलोड करके इन्सटाल करने के बावजूद भी! यहां मेरे कमरे में अपना कम्प्यूटर है जिसमें कोई मसला नहीं पर जब नेट यूज़ करने के लिए किसी साईबर सेन्टर जाता हूं तो ये डिब्बे वाला मसला हमेशा मेरे साथ रहता है। और यहां पर नेट कनेक्शन लेना उससे भी बडा मसला है इस लिए आज तक मैं ने अपने कमरे में नेट कनेकशन नहीं लिया। फिलहाल ऐसा करता हूं के नेट यूज़ करने के लिए साईबर सेन्टर जाऊँ तो अपनी USB Drive भी साथ लेकर जाऊँगा और चिटठे copy करके अपने घर मेरे कम्प्यूटर पर पढ लूँगा क्यों के मेरे कम्प्यूटर पर हिन्दी फाँट और यूनिकोड का कोई मसला नहीं सब सही है जिसमें Win2000 इन्सटाल है।


9 comments May 20, 2006

बेंगलोर

जिसे बाघों का शहर भी कहा जाता था









2 comments May 16, 2006

ऐसी रही यात्रा

घर पहुंचने के बाद सबसे मिलकर गिले शिकवे दूर होवे, अम्मी ने ज़बरदस्त खाना बनाया था, उधर सामने टीवी के खबरी चैनलों पर मीरठ का जलता हुवा मेला लोगों की चीखें औरतों का मातम और यहां मेरे आने की खुशी में ज़बरदस्त हंगामा, हंसी मज़ाक आधी रात तक शोर-शराबा और यों पहला दिन गुज़र गया।

दूसरे दिन सुबह बारह बजे उठ कर घर से बाहर निकला तो पता चला आज शहर बंद है। दिल से आवाज़ आई “पता नहीं आज कौन मरा” घर वापस आकर अखबार देखा तो कन्नड़ फिल्मों के सुपर स्टार राज कुमार उनके चाहने वालों को घम-ज़दा छोड कर आख़िरी नींद सो गऐ। राज कुमार के चाहने वालों ने अपने घम का इस तरह इज़हार किया पूरे शहर को ज़बरदस्ती बंद करवा दिया, सरकारी और पराईवेट बसों को चलाया यहां तक के पुलिस वालों को भी नहीं बखशा, टीवी पर पुलिस वालों को पिटते हुवे दिखाया।

अम्मी मेरा पासपोर्ट फाडने ही वाली थी के बस बहुत होगिया सभी शरीफ लोग अपने शहरों में शरीफों की तरह काम काज करते हैं और तुझे किया ज़रूरत है समन्दर पार नौकरी करने की? पासपोर्ट फाडने की बात सुनते ही मेरा कलिजा कांप उठा फिर बडी मिन्नतें करने के बाद पासपोर्ट मिला के सिर्फ तीन महीनों में हमेशा के लिऐ वापस आजाऊंगा।

अपने शहर को देख कर लगा जैसे नया ज़माना है, किसी ज़माने में पेजर रखने वालों को हम इज़्ज़त की निगाह से देखते थे और आज आटो रिकशा वाले, ठेले वाले सभी के पास रंगीन मोबाइल फोन दूसरी तरफ बडे बडे शॉपिंग मॉल्स यूरोप और दुबई जैसे सिटी बस और वहीं भुकमरी, गरीबी गन्दी और तंग सडकें आज भी जूं कि तूं रहीं।

दुबई वापस आया तो गर्मी ने स्वागत किया, ये तो कुछ भी नहीं अगले महीने से यहां आग उगलने वाली गर्मी पड़ेंगी। दोसतों ने खुश खबरी दी के थोडा दुबला हो गया हों। दोसतों के मुंह से अपने आप को दुबला सुन कर बहुत अच्छा लगा वरना अब तक तो वो सब मुझे मोटू कह कर छेडते थे।


8 comments May 15, 2006

दफतर में केमरे

शुक्र है मेरे सर पर या आस-पास कोई केमरा नज़र नहीं आता, कम्पनी के सभी डिपार्टमंट में केमरे लगवा दिऐ। मालिक को कहीं से शिकायत आई के उनकी कम्पनी में काम करने वाले अकसर इन्टरनेट पर खोजते रहते हैं जिसकी वजे से दफ्तरी काम सुस्त होचुका है। IT administrator ने पहले से बहुत सारे वेब साईट को कम्पनी में ब्लॉक कर रखा है जिस में ब्लॉगर के अलावा दूसरी काम के वेब साईट शामिल हैं अब मैं अपना ब्लॉग भी देख नहीं सकता इसके अलावा बहुत सारे भारती अखबारों की साईट्स भी ब्लॉक कर दिए। दफतर में अपने क्म्प्यूटर पर सिर्फ डोमेन किए होवे ब्लॉग पढ सकता हूं, गूगल और याहू की वेब साईट पर सर्च करने से सभी लिंक आते हैं पर जब किसी लिंक को click करने से पन्ना बलांक खुलता है।


4 comments April 3, 2006

सपनों में यात्रा शुरू

घर जाने के लिए और दस दिन बाकी हैं पर पिछले एक महीने से रोज़ रात को अजीब अजीब सपने आ रहे हैं। ख्वाब में अपने घर आ-जा रहा हूं। कभी मेरी फलईट मिस हो रही है, कभी बंगौर का टिक्ट नहीं मिल रहा और कभी बारिश की वजे से फलईट केन्सल हो रही है वगेरा वगेरा।

आज का ताज़ा तरीन ख्वाब ये है के एक मलबारी ने मुझ से कहा तुम कालीकट (केरला का शहर) क्यों नही चले जाते जिसका किराया भी बहुत कम है जहां से ट्रेन तुमहें सिर्फ पांच घंटों में बंगलौर पहुंचा देगी। पैसा बचाने के चक्कर में ख्वाब में ही दुबई से कालिक्ट पहुंचा और वहां से ट्रेन पकड कर बंगलौर जा रहा था के ट्रेन का एक्सीडंट हो गया सभी बोगियाँ अलग अलग होगई। ख्वाब ही में बड़बड़ाया कि कितना पागल हूं एक मलबारी के घटिया ईडिए पर कालीकट आ गया और मेरे साथ ही ऐसा होना था के ट्रेन का एक्सीडंट होगया।

अभी पिछले सप्ताह का ख्वाब है के घर पहुंचने के बाद अम्मी ने मेरा पासपोर्ट फाड फेंका बस बहुत होगया, अपने देश में सब कुछ है किया ज़रूरत है दूसरे मुल्कों में नौकरी करने की? फिर अब्बा से कहने लगीं फौरन शुऐब की शादी करवा दो वरना ये फिर दुबई भाग जाऐगा।

कहते हैं दिन भर हम जो भी करते हैं वही सपनों में नज़र आता है पर मेरे सपनों में मेरी ही आजीब आजीब फिल्में रेलीज़ होती हैं जो मैं ने कभी साईन नहीं किया।


2 comments April 1, 2006

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