Posts filed under 'तमाशा'

मूंह मीठा करें

नीचे तसवीर पर किल्क करना लड्डू खाने जैसा है :)

और हां ……. लड्डू खाने के बाद चिट्ठाचर्चा चलें वहां आज मज़ेदार चर्चा चल रही है, बहुत दिनों की खामोशी के बाद सबको एक साथ एक जगह बोलते हुए अच्छा लग रहा है …….. लड्डू बाद मे खाना  - आइये आइये चलते हैं चिट्ठाचर्चा

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12 comments November 10, 2006

शार्क पर रिसर्च

ज़िनदगी मे पहली बार ज़िनदा शार्क देखने का मौका मिला, जो खुले समुद्र से भटक कर कॉरनिश मे घुस आई। पानी के ऊपर मटकती होई मोटी टगडी मज़बूत शार्क को देखने के लिए लोग उमड पडे। बाद मे दुबई म्युनिसिपैलिटी के बहादुर बंग्लादेशी मुछेरों ने शार्क को हांकते होवे वापस खुले समुद्र की तरफ भगा दिया। जब शाम को नेट केफे पहुंचे तो जनाब को अचानक शार्क पर रिसर्च करने का शौक जागा और बहुत सी वेब साईट्स से चंद आंकडे अपने ब्लॉग के लिए खींच लिऐ:

 

 

 


1 comment July 21, 2006

कयामत ऐसी थी

शाम को होटल मे बैठे नाश्ता कर रहा था, अचानक होटल के बाहर चीखने चिल्लाने की आवाज़ें आऐं। मैं समझा कोई नई बात नहीं कुछ हादिसा हुवा होगा। अब तो अरबी ज़ुबान में नारे बाज़ी शुरू होगई, होटल के सामने ट्राफिक जाम। अन्दर बैठे चंद लोग माजरा देखने बाहर निकले तो मैं भी जल्दी से हाथ धो कर बाहर आगया। कुछ सम्झ मे नहीं आरहा के आखिर यहां हुवा किया? आस पास के इमारतों मे मौजूद लोग वो भी तमाशा देखने अपनी बालकोनियों में आकर खडे होगए। आरब लडके सीटियाँ बजाते नारे कोस रहे थे “या शबाब, या शबाब” (हए किया जवानी है) चंद खूबसूरत आरबी लड़कियॉ बिलकुल छोटे छोटे कपडे पहन कर जा रही थीं लेकिन आस पास के माहोल को देख कर लगा जैसे यहां कोई कयामत होगई हो। यहां अकसर आरब लडके कार चलाते हुवे कभी पानी मे उतर जाते है तो कभी किसी पर अपनी गाडी ठोक देते हैं। किसी भी लडकी को देख कर ऐसे दीवाने बन्ते हैं जैसे ज़िनदगी में पहली बार देख रहे हों।


3 comments June 12, 2006


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