क्या अजीब देश है हमारा, यहां कभी त्योहार खतम होने का नाम ही नही लेते कभी दीपावली की खरीदारी तो कभी रमज़ान की गहमा गहमी, कभी दशहरा तो कभी दुर्ग पूजा। पिछले चंद महीनों मे त्योहारों का जैसे एक सिलसिला चल रहा है। पहले तो पूरे भारत मे दशहरा की धूम धाम थी और लोगों ने रावन को जला कर चैन का सांस लिया ही था कि दिपावली और रमज़ान की तैयारियाँ और शुरू होगई।
रात के बारह बजते ही जहां पूरी दुनिया सोजाती है लेकिन इस वक्त रमज़ान और दिपावली के मौके पर पूरे भारत मे सवेरा हो जाता है - लोगों की चहल पहल की वजह से बाज़ारों मे रौनक लग जाती है। इस बार दिपावली के साथ रमज़ान का भी समाँ था, पूरे बाज़ार खरीदारी के लिए खचाखच भरे हुए, भारत मे इन त्योहारों के मौके पर कौन हिन्दू और कौन मुसलमान पहचानना मुश्किल है क्योंकि सभी भारतीयों का एक-दूसरे के त्योहारों मे आना-जाना और मुबारकबादी देना ज़रूरी है और तो और एक-दूसरे के घरों मे खाना भी खाते हैं और ये नज़ारा चंद नेता लोगों से हज़म नही होता, जैसे ही त्योहारों का मौसम खतम हुआ फिर दंगा फसाद शुरू करवा देते हैं - वाह क्या कल्चर है हमारा!
भारत कोई ऐसा वैसा देश नही जहां हिन्दू-मुसलमानों के बीच सिर्फ दंगे ही होते हैं - भारत के हिन्दू और मुसलमान अपस मे लडते ज़रूर हैं मगर एक दूसरे के बगैर रह भी नही सकते। वैसे तो मैं सिर्फ नाम का मुसलमान हूं और हर दिन मुसलमानों मे उठता बैठता हूं लेकिन अपने देश के कल्चर को ही अपना धर्म और भारत को अपनी मां सम्मान मानता हूं। मैं ने हमेशा से हिन्दू को हिन्दू नहीं बल्कि अपना भाई माना है हालांकि दंगों के वक्त अपने हिन्दू भाईयों से मार भी खा चुका हूं। खैर दंगे फसाद के मौके पर कौन क्या है दिखाई नही देता और ये दंगा फसाद तो हमारे देश मे रोज़ का मामूल है, फसाद किसी भी टाइप का हो मगर भुगतने वाला कोई, पकडा जाने वाला कोई, मरने वाला कोई लेकिन फसाद मचाने वाला आज़ाद - नेता लोग को कौन पकडे? जबकि पकडने, मारने और फसाद मचाने का आर्डर तो वही देते हैं।
यहां दुबई मे कहने को बहुत सारे दोस्त हैं मगर अपना जो सच्चा दोस्त है वो एक हिन्दू है, ज़रूरतों पर काम आने वाला, खुशी और दुःख मे साथ देने वाला हालांकि वो अभी तक मुझे मुसलमान ही समझता है फिर भी अपनी सच्ची दोस्ती निभाता है। हम पिछले चार वर्षों से साथ हैं लेकिन आज तक उस ने मुझ से ये नही पूछा कि दूसरे मुसलमानों की तरह तू नमाज़ क्यों नही पढता? जबकि मैं ने उस से पूछ डाला तू पूजा पाठ क्यों नही करता? उसने जवाब दियाः “हालांकि मेरे माता-पिता हिन्दू हैं और पूजा भी करते हैं लेकिन जब से मैं ने दुनिया देखा धर्म पर से विश्वास उठ गया। ये सारे लोग झूठे हैं जो सुबह शाम राम अल्लाह का नाम लेते हैं और छुप कर गलत काम भी करते हैं लेकिन मैं राम अल्लाह का नाम नही लेता सिर्फ अपने दिल की सुनता हूं जो बुरा लगे वो बुरा और जो अच्छा लगे वो अच्छा।” अपने इस दोस्त के विचार जान कर मुझे बहुत खुशी हुई, पहली बार मुझे अपने विचारों जैसा अपने ही देश का ये मित्र मिला, मैं ने अपनी किस्मत का शुक्र अदा किया। आज अपने देश मे ऐसे बहुत सारे नौजवान हैं जो अपने धर्म मे पाबंदियों की वजह से तंग आचुके वो खुल कर जीना चाहते हैं लेकिन अपने माता-पिता की इज़्ज़त के लिए आवाज़ नही उठाते। ऐसे आज़ाद विचार वाले भी अपने मां बाप से डरते हैं और उनकी इज़्ज़त करते हैं, ऐसा प्यारा परिवार भारत के अलावा और कहां मिलेगा? ये कैसा अजीब देश है हमारा, जैसा भी हो वो हमें प्यारा।
इस लेख मे कुछ खास बात नही है, लेकिन ये लेख अपने इस मित्र के नाम लिख रहा हूं जो चार वर्ष साथ रहने के बाद उसके विचारों को पहली बार जान कर मुझे सच्ची खुशी मिली।
October 27, 2006
ईद के लिए यहां दो दिन मिलने वाली छुट्टियों मे हम चंद दोस्त किराए की कारें ले कर शहर से दूर घूमने चले जाते हैं। इस बार हमारा रूम्मेट बिदप्पा (मैसूर से) ने एक सेकंड कार खरीद ली है, मगर वो हमेशा सिर्फ लडकियों को घुमाते रहता है। मैं ने उससे कह दिया इस बार ईद की छुट्टियों मे हमें अपनी कार मे घुमाने ले जाए शहर से कहीं दूर जहां शोर ना हो - वो बहुत मुश्किल से माना क्योंकि उसका प्लान दो दिन लडकियों के साथ मज़े करने का था। किराए की कारों से अच्छा है अपने दोस्त की कार हो और वो भी साथ हो तो घूमने मे बहुत मज़ा आता है।
वैसे शहर मे बहुत सारी घूमने की जगहें हैं मगर दिल और दिमाग को आराम के लिए शहर से दूर जाकर घूमना अच्छा है। यहां हम परदेसियों को वर्ष मे सिर्फ यही दो दिन मिलते हैं, वरना हर दिन वही साइकिल की तरह सुबह से शाम तक आँफिस फिर शाम को घर मे - वैसे सप्ताह मे एक दिन छुट्टी होती ही है जिसमे कपडे धोने और कुछ खरीदारी करने मे पूरा दिन लग जाता है। हमारे लिए ये दो दिन छुट्टी के गनीमत हैं, ऐसा महसूस होता है जैसे पूरे साल भर की थकान इन दो दिनों मे उतारली
यहां ईद मनाने के लिए चांद देखते हैं मगर ये हमारे लिए छुट्टियों का चांद है
दिवाली की मुबारकबाद
कल जब ये तीनों चिट्ठे गिरिराज जोशी, समीर जी और फुरसतिया जी को पढा तो कुछ भी समझ नही आया जैसे कोड वर्ड मे बात चीत हो रही है
अपना छोटा दिमाग है बडी बातें नहीं घुसतीं
सुबह दफ्तर मे कुछ काम करलेने के बाद नारद और चिट्ठाचर्चा को सलाम करता हूं जिसके बगैर जैसे पूरा दिन अधूरा है। मगर ये हिन्दी चिट्ठे जो ब्लॉगस्पाट पर हैं, मैं वो सब चिट्ठे पढ तो सकता हूं लेकिन मेरी मजबूरी है कि उन पर टिप्पणी लिख नही सकता सिर्फ वर्ड प्रेस डाट कॉम वाले चिट्ठों को टिप्पणी दे सकता हूं। जहां तक हो सका मैं ने बहुत सारे हिन्दी चिट्ठाकारों को दिवाली की मुबारकबाद दिया, फिर भी उन लोगों के लिए जिन का चिट्ठा ब्लॉगस्पाट पर है, मैं अपनी इस पोस्ट के से सभी हिन्दी चिट्ठाकारों को दिवाली की शुभकामनाएँ और मुबारकबाद पेश करता हूं।
October 19, 2006
घर से निकलते वकत अम्मी ने बहुत समझाया के कुछ तो खाना पकाना सीखले, वहां जाकर क्या खाएगा? हम ने दो टोक जवाब दिया थाः वहां जाकर देखा जाएगा। अम्मी ने कहाः अंडा फिराई करना तो सीखले। हमारा जवाब थाः अभी जाने के वकत क्या किया सीखना पडेगा और ऊपर से टाइम भी बहुत कम है हमारे पास। अब यहां आए चार वर्ष होने को हैं, होटलों का खा खाके अदनान समी को भी पीछे छोड दिया - वैसे भी होटलों मे पकने वाले खानों से हर कोई वाकिफ है और हमेशा होटलों का खाने से अजीबवगरीब बीमारियाँ? वहां घर के खानों मे नकस निकालना और मस्ती करना, कितना भी अच्छा पका हो फिर भी मां को कोसना के क्या ऐसा पकाया है?। हर किसी को घर से दूर घर का खाना बहुत याद आता है। खैर हमने घर का खाने के लिए जो मस्ती की थी अब उसकी सज़ा भी भुगत रहे हैं। घर से दूर इतने वर्षों बाद आज पहली बार तीन अंडे बरबाद करने के बाद आखिरकार चौथा अंडा फिराई करने मे हम कामयाब रहे - मुबारक हो जनाब 
August 25, 2006