Posts filed under 'ये ज़िनदगी'

आज छुट्टी है?

सुबह सबेरे परेड ग्रऊँड पहुंचो, तिरंगा लहराव,
मन्त्रीयों का भाषन सुनो और तालियाँ बजाउ फिर मिठाई खाउ

 

आज सुबह सिर्फ दो घंटे आज़ादी का जशन मनाने के बाद बाकी पूरा दिन छुट्टी है
हम सब भारतीयों को 59 वीं आज़ादी की छुट्टी मुबारक

आज सुबह को सभी भारतीयों ने आज़ादी मिलने की खुशी मे अपने जोश और जज़बे का इज़हार देश भक्त गीतों से किया फिर सभी भारतीयों ने पूरी आज़ादी के साथ सुबह सुबह थंडी सांस ली क्योंकि आज छुट्टी का दिन है। और ऐसे भी लोग हैं जो आज का दिन सिर्फ छुट्टी समझ कर गुज़ार देते हैं। स्कूली बच्चों को याद दिलाया जाता है कि किस तरह शहीदों ने अपनी कुरबानियों से इस देश को आज़ाद करवाया, और इनही की वजा से आज हम आज़ादी के साथ सांस ले रहे हैं। बच्चे तो मान जाते हैं मगर आज भी चंद लोगों का रोना है कि ये कैसी आज़ादी है? कौन कहता है कि भारत आज़ाद देश है? ऐसे लोग और पचास साल बाद वैसे ही रोते नज़र आऐंगे कि भारत तो आज़ाद है मगर हम अभी तक गुलाम हैं। आज अगर भारत चीन और अमेरिका से दो कदम पीछे है तो सिर्फ उन लोगों की वजा से जो इसी देश का खाते हैं और दूसरे देशों का गाते हैं और तो और इतने बडे आज़ाद देश मे डरते हुए सांस लेते हैं। देखा जाए तो हर कोई सच्चा भारती अपने देश मे पूरी आज़ादी से सांस ले रहा है क्योंकि ये सिर्फ अपना देश ही नही बल्कि हमारी मां सम्मान देश है और अपनी मां की गोद मे बैठ कर पूरी आज़ादी से सांस लेने वाला किसी से डरता नही और वोह आराम से मज़े मे रहता है। अपनी किस्मत का शुक्र अदा करना चाहिए कि हम एक जन्नत जैसे देश मे पूरी पूरी आज़ादी से हैं। आज अखबारों मे खबरें पढ कर डर लगता है कि किस्मत मे अगर हमारा जनम किसी ऐसे वैसे देश मे होता तो —- ऊपर वाले ने हमारी किस्मत चमकादी जिसने हमें एक आज़ाद और खुशहाल देश का शहरी बनाया और बाकी दुनिया की नज़रों मे इज़्ज़त दी जिस पर फखर से कहने को दिल करता है हम हिन्दुस्तानी हैं।


3 comments August 15, 2006

ग्रीन चाय

हम भारती चाय के शौकीन हैं ही मगर चाय ऐसी जिस मे दूध, चीनी और इलाईची हो जिसे हम स्पेशल चाय कहते हैं। यहां अरब देशों मे लोग बगैर दूध की चाय पीते हैं यानी काली चाय । हम भारतियों को देख कर कुछ अरबी लोग दूध वाली चाय भी पी जाते हैं। यूरोप से हमारी एक मित्र ने चेटिंग पर बताया कि उनके यहां पोलैंड मे लोग ग्रीन टी (हरी पत्ती) पीना पसंद करते हैं। हमारी मित्र ज़ोशिय खुद कहती है कि ग्रीन टी पीने से सहत अच्छी बनी रहती है और उससे मोटापा भी नही आता। उसी के मशवरे पर हम ने भी सुपर मार्केट से लिपटन का ग्रीन टी उठा लाया और आज पूरा एक महीना बीत गया हमने सिर्फ एक टी बेग यूज़ की —- इतनी कडुवा कि मैं बता नही सकता, मगर वो कहती है सहत के लिए बहुत अच्छा है — ऐसी चाय उसी को मुबारक।


6 comments July 30, 2006

कैसे करूँ शादी?

अम्मी ने मेरे लिए एक लडकी का फोटो साथ मे उसका बयुडाटा भेजा, वोह 22 वर्ष की BA पास खूबसूरत लडकी है साथ मे पांच वकत की नमाज़ी भी और उसका पूरा खानदान माशा-अल्लाह पक्का इसलामी और दीनदार है उन्हें भी पांच वकत का नमाज़ी और पक्का लडका चाहिए। यहां मेरे चंद मुसलमान मित्रों के साथ इस बारे मे बात किया तो बताया कि लडकी मे कुछ बुराई तो नही सोच समझ कर हां कह दे। मैं ने लडकी के घर वालों को डैरेक्ट खत भेजा जिसमे शादी की शर्त रखी कि अगर शादी होगी तो कोर्ट मे होगी वोरना नहीं। लडकी वाले आग बगला होए और हमारे घर जाकर झगडा किया कि कैसी तरबियत दी है अपने बेटे को? आपका बेटा मुसलमान है या फिर कोई और?? भाई हम मुसलमान हैं शादी घर मे हो या मसजिद मे मगर निकाह ज़रूरी है और आपका बेटा कहता है कि वोह कोर्ट मे शादी करेगा छी छी —— किया लडकी को भगा के शादी करेगा या फिर लडकी लावारिस है?

उसके दूसरे दिन अम्मी ने मुझे फोन पर खूब सुनाई, तेरे विचार बताने की किया ज़रूरत थी? कितना अच्छा खानदान है ढूंडने से भी नही मिलता। अम्मी से बात करते होवे मेरी बोलती गुम होगई क्योंकि अब्बा भी वहीं थे। मैं ये बताना चाह रहा था कि अपनी होने वाली पार्टनर को अपने बारे मे सब कुछ सच सच बता देना चाहता हूं क्योंकि बाद मे वोह ना पछताए और मुझे गालियाँ दे कि पहले क्यों नही बताया। मैं खुल कर अपने विचार अपने घर वालों को बता नही सकता वोरना अब्बा खुद मेरी मौत का फत्वा निकाल देंगे और शाही इमाम दिल्ली से बेंगलौर तक मेरे खिलाफ जुलूस लेकर जनाज़ा के साथ पहुंच जाएगे।

अपने विचारों को शेर करने के लिए ये मेरा ब्लॉग काफी है और मेरी डाईरी यही ब्लॉग है, अपने ब्लॉग पर पूरी आज़ादी के साथ अपने विचार लिख सकता हूँ जो बोल नही सकता। भारत मेरा पहला धर्म है जहां मैं पैदा होवा और उसी देश के बनाए कानून के मुताबिक कोर्ट मे शादी करूँगा मगर ऐसी लडकी मिलेगी कहां?


9 comments July 17, 2006

चश्मा

मेरी नज़र कमजोर तो नही फिर भी पिछले आठ वर्षों से चश्मे के बगैर क्म्प्यूटर की स्क्रीन को नही देख सकता और अगर किसी दिन अपना चश्मा घर भूल आया तो दफतर मे कुछ काम नही कर सकता, अब तो चश्मा मेरी रोजी रोटी बन गया है क्योंकि क्म्प्यूटर के सिवा मुझे दूसरा कोई काम नहीं आता और चश्मे के बगैर क्म्प्यूटर चला नहीं सकता। मैं चश्मे के बगैर अखबार पढ सकता हूं, अँधेरे मे भी कुछ कुछ देख सकता हूं मगर टीवी, सिनेमा और क्म्प्यूटर की स्क्रीन नहीं देख पाता। अब तो क्म्प्यूटर पर गारमंट (Fabric) डिज़ाईन कर रहा हूं जो बहुत ही बारीकी का काम है यानी और ज्यादा नज़र कमजोर होने का काम है।


2 comments June 25, 2006

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