मां, भूक लगी है

जून 6, 2006 at 9:52 पूर्वाह्न 5 टिप्पणिया

ये शब्द सुनते ही मां की ममता तडप उठती है वो किचन की ओर डोडती है और कोशिश करती है कि जल्दी से उसके लाडले के लिए खाना गरम करे। हम जब स्कूल से वापस घर आते हैं किताबें एक तरफ डाल कर आराम से सोफे पर बैठ कर चिल्लाते हैं “मां भूक लगी है जल्दी से खाना दे” मां झट से खडी होजाती है भले वो बीमार हो, और प्यार से कहती है “हाथ मुंह धोले बेटा अभी खाना लगाती हूं।”

यहां परदेस में मां बहुत याद आती है और साथ में अपना बचपन भी।

बरसात में भीगो तो डांटना फिर तोलिये से हमारा सर पोंछना, सुबह सवेरे हमें जगाना ज़िद करो तो कमबल खींच लेना। बीमारी में ज़बरदसती हमारे मुंह में दवाई ठोसना और आधी रात को उठ कर हमारी कमबल सीधी करना। जल्दी जल्दी नाश्ता बनाए साथ ही पलट कर बाथ रूम में हमारी पीठ पर साबुन भी मलदे। स्कूल से घर देर से लोटें तो दरवाज़े पर हमारी राह देखते परेशान खडी रहना। शरारत पर पिटाई करना और अच्छे काम करो तो हमारे सर पर प्यार से हाथ फेरना। पिता पिटाई करे तो मां हमें सीने से लगा लेती है और जब वो खुद हमें पीटती है गुस्सा थनडा होने पर दुबारा हमें सीने से लगा लेती है। पिता गुस्से में आकर औलाद को घर से निकाल दे पर मां अपने बच्चों की खुशी के लिए खुद घर छोड देती है। बाप के कतल के एलज़ाम में कानून बेटे को सज़ा देता है पर मां अपना सुहाग उजाडने वाले बेटे को माफ करदेती है। उसके बच्चों का सुख अपना सुख, उसके बच्चों का दर्द अपना दर्द, उसके बच्चों की परेशानी अपनी परेशानी और खुद अपना दुख भुलाने के लिए कोने बैठ कर रोती है। वो अपने बच्चों को खाना खिलाने तक चैन से नहीं बैठती, लोग कहते हैं मां भगवान का रूप है लेकिन मैं कहता हूं मां ही भगवान है।

Advertisements

Entry filed under: टैम पास.

लककी नम्बर कयामत ऐसी थी

5 टिप्पणियाँ Add your own

  • 1. आशीष  |  जून 6, 2006 को 8:11 अपराह्न

    शोयेब भाई, मेरे पास शब्द नही है प्रतिक्रिया के लिये !

  • 2. संगीता मनराल  |  जून 7, 2006 को 5:16 पूर्वाह्न

    शोयेब जी, सत्य वचन हैं, माँ, भगवान का ही रूप होतीं है|

  • 3. SHUAIB  |  जून 8, 2006 को 10:05 पूर्वाह्न

    आशीषः
    मेरे ब्लॉग पर आने के लिए आप का शुक्रिया।

    संगीता मनरालः
    बेहन जी आपका शुक्रिया और ये आपका अपना खयाल है, मैं तो माँ को भगवान ही मानता हूं।

  • 4. अनूप शुक्ला  |  जून 12, 2006 को 5:20 पूर्वाह्न

    http://hindini.com/fursatiya/?p=141
    यह कविता खासतौर से आपके लिये।

  • 5. MAN KI BAAT  |  जून 15, 2006 को 9:46 पूर्वाह्न

    माँ कभी भी बच्चों को अपने से अलग नहीं मानती है।
    प्रेमलता–>

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s

Trackback this post  |  Subscribe to the comments via RSS Feed


हाल के पोस्ट

जून 2006
सोम मंगल बुध गुरु शुक्र शनि रवि
« मई   जुलाई »
 1234
567891011
12131415161718
19202122232425
2627282930  

Feeds


%d bloggers like this: