इनसे मिलो – 12

जुलाई 14, 2006 at 9:35 पूर्वाह्न 5 टिप्पणिया

ये खुदा है

हिन्दी ब्लॉग जगत मे आज कल आतंकवादीयों की टांग खींची जा रही है तो फिर मैं क्यों चुप रहूँ? लेकिन मेरा अन्दाज़ सबसे अलग है, आतंक के मामले मे मैं खुदा को भी नही बखश्ता। तो पेश है उर्दू से हिन्दी ट्रांसलेट मेरा एक पुराना लेख

मुजाहिदीन के सरदार मुल्ला बखश को ज़नजीरों मे जकडे खुदा के सामने हाज़िर किया, अमेरिका ने इलज़ामात लगाने शुरू किएः ये आदमी खुदा के नाम पर दंगा फसाद करवाता है, नौजवानों को भडका कर उनसे कतल-गारतगीरी करवाता है और फिर इस काम को खुदा खुशी कहता है और तो और अगर इसके चीले (मुजाहिद) पुलिस इनकॉनटर मे मारे जाएं तो उन्हें शहीद का नाम देता है। अमेरिका की बात सुन कर खुदा को हंसी आईः पता नही किस नमूने को उठा लाए? इसका हुलिया देखो ये कहां से मुजाहिद लगता है? चेहरे पर अजीब झुर्रियां, फटे पुराने कपडे, मैल भरे नाखून, सर पर गुंबद जैसी पगडी और छाती तक दाढी ये तो सौ फ़ीसदी फकीरों जैसा है। अमेरीका ने खुदा को याद दिलायाः मुजाहिदीन की यही पहचान है। ये लोग पहाडों, जंगल और खनडरों या फिर मज़ारों के आस पास बसेरा करते हैं। इतना सुनना था कि खुदा गज़ब मे अगयाः मेरी इज़्ज़त और जलाल की कसम! क्यों रे मुल्ला तेरी ये मजाल कि मेरे नाम पर दंगा फसाद और उस पर जिहाद का लेबल —- अखिर ये कौनसा कारोबार है? अमेरिका ने खुदा से कहाः ये तो कुछ भी नही, उनके सबसे बडे सरदार उसामा आज भी फरार हैं। अचानक मुल्ला चीख पडाः हां मैं मुजाहिद हूँ, कसम खुदा की मुझे छोड दिया जाए वोरना मेरे मुजाहिदीन दुनिया को जला कर राख करदेंगे। मुल्ला की बात सुन कर खुदा खौफज़दा होगयाः अरे ये तो सच मुच मुजाहिद है और इसके अन्दर कूट कूट कर मुजाहिदाना जज़बात हैं फिर खुदा ने मुल्ला को गले लगाया और अपने पास बिठा कर उसके कान मे कहाः अगर उसामा का पता बतादे तो चार बोरी गांजा मुफ्त पाएगा। खुदा की बात सुन कर मुल्ला लालच मे अगया और सब कुछ सच सच बताने लगाः उसामा बेचारे तो अमेरिका के गुलाम और उसी के हुकम पर छुपे होवे हैं — जारी है

बाकी फिर कभी

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खुदा से मिलो इनसे मिलो – 22

5 टिप्पणियाँ Add your own

  • 1. e-shadow  |  जुलाई 14, 2006 को 7:03 अपराह्न

    मज़ा आ गया, बहुत सुंदर लिखते है आप.

  • 2. संजय बेंगाणी  |  जुलाई 14, 2006 को 9:17 अपराह्न

    इस प्रकार का लेखन हिम्मत का काम हैं.

  • 3. Pankaj Bengani  |  जुलाई 15, 2006 को 4:48 पूर्वाह्न

    यार सुहैब, यकीन नही होता. सचमुच….. आप मुस्लीम परिवार से ही हो ना.. भाई इतना हिम्मतवाला इंसान!!

  • 4. मनीष...Manish  |  जुलाई 15, 2006 को 8:21 पूर्वाह्न

    अरे ये तो सच मुच मुजाहिद है और इसके अन्दर कूट कूट कर मुजाहिदाना जज़बात हैं फिर खुदा ने मुल्ला को गले लगाया और अपने पास बिठा कर उसके कान मे कहाः अगर उसामा का पता बतादे तो चार बोरी गांजा मुफ्त पाएगा।
    🙂 🙂

    रोचक है आपका विवरण ! अगली कड़ी का इंतजार है ।

  • 5. मनीष...Manish  |  जुलाई 15, 2006 को 8:31 पूर्वाह्न

    This post has been removed by the author.

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