पहला नशा

अगस्त 10, 2006 at 12:55 अपराह्न 12 टिप्पणिया

हम तो अपनी जगह खडे थे मगर आस-पास की सभी चीज़े घूम रही थीं। फिर लगा कि पैर भी डगमगाने लगे और धडाम से ज़मीन पर गिर पडे। यार दोसतों ने सहारा दिया और सोफे पर बिठाया। अजीब बेचैनी, पानी पीने को भी मन नही कर रहा, कोई सीधा बात करे तो उसे डांट कर कहते कि ज़बान संभाल के बात करो। फिर महसूस किया कि कुछ तो गड बड है हम शरीफ आदमी हैं और अचानक ऐसे अजीब दौरे परेशानी की बात है, इस से पहले कि हमारी आंख लग जाए – हम ने अपने फ़्लैट शारजाह जाने के लिए दुबारा खडे हुए तो दोसतों ने मना किया कि ऐसी हालत मे ना जऊ कल सवेरे चले जाना। इस हालत मे भी हमे याद आया कि कल शुक्रवार है और हमें कल एक घंटा पहले ड्यूटी पर जाना है यानी सुबह आठ बजे दोसतों को बताए बगैर हम फ़्लैट से बाहर निकले, लिफ्ट मे घुसते ही नीचे बैठ गए, कुछ देर बाद याद आया कि ग्रऊँड फलोर का बटन दबाया ही नही – बिलडिंग से बाहर निकल कर चौराहे पर लगी बडी सी घडी को डगमगाती आंखों से देखा तो रात के दो बज रहे थे। टैक्सी को इशारा किया तो कमबख्त हमें देखे बगैर निकल गया। ज़्यादा देर तक खडे रहने की हिम्मत ना रही, बैठने के लिए आस-पास नज़र दौडाई तो करीब ही एक टैक्सी खडी नज़र आई (हां वोह टैक्सी ही थी) ड्राईवर की इजाज़त के बगैर टैक्सी का दरवाज़ा ज़ोर से खोल कर अंदर बैठ गए तो ड्राईवर ने हमें गुस्से से घूरा और हमने हुकम दिया कि शहारजाह चलो। ड्राईवर हमारी हालत देख कर समझ गया कि कौन ऐसों के मूंह लगे। इसके बाद पता नही हम दुबई से किस तरह अपने फ़्लैट शहारजाह पहुंचे?

दुबई मे हमारे एक मित्र का जनम दिन था, पार्टी शार्टी का ऐलान किया। सब एक ही कम्पनी के थे और यहां UAE मे हम बेचलर्स को कभी कभी ही ऐसा मौका मिलता है कि सब मिल कर खुशी मनाएं वरना यहां किसी को भी अपने काम से हट कर फुरसत नही। और जब जनम दिन की पार्टी मे आने वाले सब एक ही कम्पनी के यार दोसत हों तो ज़बरदस्त हंगामा है। सबको मालूम है कि हम शरीफ आदमी पानी और जूस के सिवा कुछ नही पीते मगर कुछ शरीर मित्रों ने हमे औरेंज जूस मे वोडका मिला कर पिला दिया और ये दो दिन बाद पता चला जब सब दोस्त हमें देख कर हंस रहे थे।

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12 टिप्पणियाँ Add your own

  • 1. आशीष  |  अगस्त 10, 2006 को 2:26 अपराह्न

    ये गलत हुआ आपके साथ। ऐसे दोस्तो से बचकर रहीये !

  • 2. राम चन्द्र मिश्र  |  अगस्त 10, 2006 को 3:38 अपराह्न

    नशा तो ठीक ठाक हो गया, अब खुमार की बारी है..

  • 3. समीर लाल  |  अगस्त 10, 2006 को 4:08 अपराह्न

    वैसे तो गलत हुआ आपके साथ.मगर स्वाद कैसा रहा?:)
    खैर, आगे से इन मित्रों पर विशेष नज़र रखें.

  • 4. ई-छाया  |  अगस्त 10, 2006 को 6:36 अपराह्न

    खुदा ना खास्ता अगर कुछ हो जाता तो वे इस कदर हंस न रहे होते।
    अमां यार नाक तो सही सलामात थी आपकी, वैसे वोदका गंधहीन होती है फिर भी।
    आइंदा जूस भी न पियें।

  • 5. ई-छाया  |  अगस्त 10, 2006 को 6:36 अपराह्न

    खुदा ना खास्ता अगर कुछ हो जाता तो वे इस कदर हंस न रहे होते।
    अमां यार नाक तो सही सलामत थी आपकी, वैसे वोदका गंधहीन होती है फिर भी।
    आइंदा जूस भी न पियें।

  • 6. Raman Kaul  |  अगस्त 11, 2006 को 1:29 पूर्वाह्न

    ‘मीर’ के दीनो मज़हब को अब पूछते क्या हो, उन ने तो,
    कशका खींचा दैर में बैठा, कब का तर्क इस्लाम किया।

  • 7. Tarun  |  अगस्त 11, 2006 को 2:55 पूर्वाह्न

    नशा शराब में होता तो नाचती बोतल…..

  • 8. सागर चन्द नाहर  |  अगस्त 11, 2006 को 5:26 पूर्वाह्न

    कितने पैग ज्यूस पिये थे ?

  • 9. SHUAIB  |  अगस्त 11, 2006 को 7:31 पूर्वाह्न

    दोसतों ने मुझे धोके से पिलाया, सर बहुत चकराया कि 😦 अब मैं ने तौबा करलिया कि आईंदा से तोसतों का जूस भी नही पियोंगा।

    आशिष भाईः धन्यवाद, आगे से एहतियात करता हूं।
    मिश्रा जीः नशा और खुमार दोनों उतर गए – अब ठीक हूं 🙂
    समीरजिः गलत ऐसा हुवा कि सुवाद का पता बहुत देर बाद पता चला 😦
    छायाजीः शुक्रिया – अब भी ये सोच कर डर लगता है कि कहीं मैं रासते मे ही ढेर ना होजाता और पुलिस मुझे उठा लेजाती 😦 अब मैं अपना जूस खुद बना कर पियूंगा 🙂
    रमणजीः ये किया? 😀 😉
    तरुणजीः कही आप हमारा मज़ाक तो नही कर रहे – अरे यार बहुत बुरी चिज़ है ये।
    सागर साहबः यार आप मुझ से पूछ रहे हो या फिर टेस्ट कर रहे हो 😉 मैं ने सिर्फ दो गिलास औरेंज जूस पिया था।

  • 10. Jitu  |  अगस्त 11, 2006 को 10:06 पूर्वाह्न

    ये कौन से दोस्त है जो आपके परेशान होने पर हँसते है।
    तुरन्त ऐसे दोस्तों से किनारा करिए।
    बुजुर्गो का कहना है कि पहला नशा, पहली दारुबाजी, घर के अन्दर करनी चाहिए।

    खैर आगे से विशेष ध्यान रखिएगा।

  • 11. संजय बेंगाणी  |  अगस्त 12, 2006 को 1:58 अपराह्न

    आशा करता हूँ कोई हमें भी धोके से पिलाएगा. कम से कम पता तो चले यह नशा होता क्या बला हैं. अपनी मर्जी से तो पी नहीं पाएंगे.
    आप कुशलता से घर पहुंच गए यही अच्छा हुआ.

  • 12. SHUAIB  |  अगस्त 12, 2006 को 2:34 अपराह्न

    जीतू भैयाः ठीक फरमाया आपने – आगे से ऐसे दोसतों से थोडा दूर ही रहूंगा।
    संजयजीः ये वोडका बहुत ही खतरनाक चीज़ है, भगवान ना करे कभी आपको इस से वासता पडे

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