ये खुदा है – 36

अक्टूबर 24, 2006 at 2:08 अपराह्न 9 टिप्पणिया

 [ ईद का भाषण ]

 बिल गेट्स ने जब नया विस्टा दिखाया तो खुदा की समझ मे कुछ ना आया। आज न्यूयार्क शहर मे सब की नज़रें बुर्खा पोश नारियों पर टिकी रहीं, किसी ने अफवाह फैलादी कि खुदा बुर्खा पहन कर शहर मे घूम रहा है। शाम को सरकारी न्यूज़ चैनल पर अनाऊँस करवायाः अफ़वाहों पर ध्यान ना दें, खुदा बुर्खा मे नहीं बल्कि पनामा की एक बस मे पटाखे ले जाते हुए धमाका मचा दिया। दूसरे दिन ईद के मैदान मे खुदा ने अपना भाषण शुरू किया और वही पुरानी बातें दुहराने की कोशिश की जो मुल्ला साहिबान पहले बता चुके थे। ईदगाह से बाहर हज़ारों गरीब और फकीर लोग खुदा की एक झलक देखने के लिए G8 वालों से झगडा कर रहे थे वहीं परदे के पीछे अफगानी तालिबान डंडे ले कर खुदा के फरिश्तों को पीट रहे थे कि उस वक्त मदद को क्यों नही आए जब अमेरिका ने हम पर हमला किया था? तभी ईद के मैदान मे ज़बरदस्त हलचल मच गई जब खुदा ने अपने भाषण मे अचानक अमेरिका की तारीफ करडाली। जापान ने वाक आऊट किया तो इन्डोनेशिया भी गुस्से मे मैदान छोड बाहर निकल आया। खुदा के भाषण की बे हुर्मती, दोनों देशों को एक बार फिर भूकंप से हिलाडा। खुदा का गुस्सा देख उ.कोरिया ने तौबा करली और वादा किया कि आइंदा से सिर्फ छोटे पटाखे जलाएगा। खुदा ने अपना भाषण जारी रखाः भारत मे एक की बजाए दो ईदें अजीब बात है, चंद लोगों को आज चांद दिखाई दिया तो बाकीयों को कल दिखाई देता है जब्कि हम ने एक ही चांद बनाया था। सऔदी अरब ने खुदा का शुक्र अदा किया कि हमें चांद तो नज़र ना आया मगर ईद करडाली अब तो खुले आम दबाके खाएंगे क्योंकि बगैर चांद देखे रमज़ान की छुट्टी करडाली। मुशर्रफ भी खडे होकर कहने लगेः हम तो चांद देख कर ही ईद मनाएंगे अगर से वो वर्षों बाद भी दिखाई दे। फिर मुशर्रफ ने खुदा को दावत भी दिया कि ईद हमारे साथ पाकिस्तान मे मनाएं तो खुदा ने तौबा करली क्योंकि पाकिस्तान मे उसकी सिक्यूरिटी का कोई इनतेज़ाम ही नही और मुमकिन है खुदा को पाने के चक्कर मे शिया-सुन्नी झगडा कर बैठें। जब आखिर मे इबादत का वक्त आया तो अमेरिका ने बुलंद बांग अज़ाँ कहीः सारे जहां का मालिक खुदा है मगर वो अमेरिका के कब्ज़े मे है — जारी

बाकी फिर कभी

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छुट्टियों का चांद ये भारत है जनाब !!!

9 टिप्पणियाँ Add your own

  • 1. Pratik Pandey  |  अक्टूबर 24, 2006 को 6:32 अपराह्न

    बहुत खूब शुऐब भाई। लगता है ख़ुदा का भाषण खुद जॉर्ज बुश ने लिखा था।

  • 2. अनुराग श्रीवास्तव  |  अक्टूबर 25, 2006 को 2:12 पूर्वाह्न

    चाँद दिखा या चाँद नहीं दिखा इस चक्कर में आजकल सारे त्योहार दो दो दिन मना लिये जाते है। हमको यह ज़हमत नहीं उठानी पड़ती

    दिल के आसमान पर तस्वीर टांग कर तेरी
    रात दिन तुमको देखा करते हैं
    साल के दिन तो आते जाते हैं
    हम तो हर दिन ही ईद करते हैं।

    वैसे डा बच्चन ने ‘मधुशाला’ में कुछ यूं कहा है

    “एक बरस में एक बार ही जलती होली की ज्वाला
    एक बार ही लगती बाज़ी जलती दीपों की माला
    दुनिया वालों किंतु किसी दिन आ मदिरालय में देखो
    दिन को होली रात दिवाली रोज़ मनाती मधुशाला”

    मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है, त्योहार मनाने का कारण है रोज़मर्रा की जिंदगी में थोड़ा बदलाव लाना। एक दिन के लिये 9 से 5 वाला चक्र तोड़ कर अपनी मस्ती में रम जाना, मद मस्त हो जाना – मानो कि बस पी रखी हो। अब चांद देख कर यह अहसास आये या बिना देखे या शायद ‘उनका’ चांद सा चेहरा देख कर आये। उद्देश्य तो मात्र यह है कि भैया एक दिन की छुट्टी तेरी मेरी खुट्टी (काम से) ।

    शुऐब, आप लिखते दिल खोल कर हैं – बधाई!

  • 3. अनूप शुक्ला  |  अक्टूबर 25, 2006 को 2:52 पूर्वाह्न

    बहुत खूब भाई. आपके लेखों में तो कबीर की आत्मा और परसाई जी की अंतरराष्ट्रीय समझ का अंश दिखता है

  • 4. अनूप शुक्ला  |  अक्टूबर 25, 2006 को 2:53 पूर्वाह्न

    बहुत खूब भाई. आपके लेखों में तो कबीर की आत्मा और परसाई जी की अंतरराष्ट्रीय समझ का अंश दिखता है.आपको ईद मुबारक

  • 5. Tarun  |  अक्टूबर 25, 2006 को 3:06 पूर्वाह्न

    शुएब, ईद का भाषण सही दिये हो, अभी अभी प्राप्त समाचारों के अनुसार बुखारी को चांद अचानक पहले दिख गया।

  • 6. जगदीश भाटिया  |  अक्टूबर 25, 2006 को 9:36 पूर्वाह्न

    चांद के मामले मे भी राजनीति होती है, कमाल है भाई !! त्योहार तो मिलजुल कर एकमत से मनाना चाहिये।
    अच्छा लिखा है 🙂

  • 7. गिरिराज जोशी  |  अक्टूबर 25, 2006 को 11:25 पूर्वाह्न

    बहुत खूब शुएब भाई.

    ईद मुबारक!!!

  • 8. PRABHAT TANDON  |  अक्टूबर 26, 2006 को 11:15 अपराह्न

    हर बार की तरह यह पोस्ट भी अनूठी लगी। व्यंग -2 मे आपने शुएब बहुत कुछ कह डाला जो समझने वालों के लिये बहुत है। आप जैसा लिखते हैं वैसा ही लिखते जाइये।
    धर्म के ठेकेदारों ने अपनी नाक को प्रतिष्ठा का प्रश्न बनते हुये इस बार भी ईद का मजा किरकिरा कर दिया। इस संदर्भ मे मौलाना कल्बे सादिक का बयन गौरतलब है। वह कहते हैं कि अब मुसिलिम उलेमाओं को चाँद की ओर देखना छोड कर खगोलशासित्रयों की भविष्यवाणियों की ओर धयान देना चाहिये। वैसे सही मायने मे अनुराग ने लिखा,”मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है, त्योहार मनाने का कारण है रोज़मर्रा की जिंदगी में थोड़ा बदलाव लाना। एक दिन के लिये 9 से 5 वाला चक्र तोड़ कर अपनी मस्ती में रम जाना, मद मस्त हो जाना – मानो कि बस पी रखी हो। अब चांद देख कर यह अहसास आये या बिना देखे या शायद ‘उनका’ चांद सा चेहरा देख कर आये। उद्देश्य तो मात्र यह है कि भैया एक दिन की छुट्टी तेरी मेरी खुट्टी (काम से) ।”

  • 9. rahman  |  सितम्बर 10, 2009 को 1:56 पूर्वाह्न

    suibe kafir aja tera gand maru

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